मंगलवार, 25 अगस्त 2009

कविता--जब बच्चे खेलते है

जब बच्चे खेलते है
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माएं चीखती रहती है
सारे दिन
बच्चें टंगे रहते छतो पर
दौड़ते रहते मैदानों में
उडाते रहते है पतंग

माएं बैठी रहती है
थाली में रोटी लिए
बच्चों को भूख नही लगती

माएं झींकती रहती है
बच्चे मिट्टी से सने हाथों से
मुंह में भर कर चावल हँसते रहते है

माँओं को चिंता है बच्चों की
बच्चे सोचते है
उस काले पिल्लै के बारे में
जिस की टांग दब गई थी
स्कूटर के नीचे


बच्चों को याद है
ढेर सारी कवितायें
बच्चे सुनना चाहते है
कहानियाँ और कहानियाँ

माएं आश्चर्य से भर उठती है
जब बच्चे खेलते है
घर घर का खेल

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