शनिवार, 22 सितंबर 2012

कविता 
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सही  समय 
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सही  समय ज्ञात करना 
आसान  नहीं है 
अक्सर  हमें सही समय का 
पता  नहीं होता 

दीवारों  पर टंगी या
कलाई पर बंधी घड़ियाँ 
या तो समय से आगे होती है 
या फिर समय से पीछे 

शहर के घंटाघर की घड़ियाँ 
बंद पड़ी रहती है कई दिनों तक 
पुलिस लाइन में बजने वाले घंटों की 
आवाज़ सुनाई नहीं देती इन दिनों 

ऐसे  में सही समय  ज्ञात करना 
आसान नहीं है 
घड़ियाँ अगर सही भी चल रही हों 
तब भी ये कहना मुश्किल है 
वे समय सही बता रही है 

दरअसल समय , समय होता है 
आगे या पीछे हम होते है या घड़ियाँ 
अच्छा या बुरा जो होता है 
उसे तो होना ही है 
समय अच्छा या बुरा नहीं होता 
अच्छा या बुरा होता है जीवन 
एक ही समय में 
अनेक जीवन जी रहे होते है लोग 

समय के साथ चलता है जीवन 
चलते चलते ठहर जाता है जीवन 
समय न ठहरता है 
न  मुड कार देखता है 
मुड कर  देखता है जीवन 
समय आगे निकल जाता है 

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[ "अक्षर-पर्व " जुलाई ' २०१२ में प्रकाशित ]
 

बुधवार, 19 सितंबर 2012

कविता 
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पुरस्कार - सम्मान

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जिस तरह

पैसे और पानी का

कोई रंग नहीं होता

उसी तरह

पुरस्कार - सम्मन का भी

कोई रंग नहीं होता


पुरस्कार सम्मान

कहीं से भी मिले

ले लेना चाहिए


पुरस्कार सम्मान

लेते समय

विचार धारा को
दर किनार कर देना चाहिए

पुरस्कार-सम्मान
किसी सेठ साहूकार का हो
या अकादमी सरकार का
चाहे दे रही हो कोई विदेशी कम्पनी
अन्तोगत्वा हमारी
रचनात्मकता का सम्मान ही है

पुरस्कार -सम्मान
कंचन की तरह पवित्र होते है
कहा भी है किसी कवि ने 

परयो अपावन ठोर पर 
कंचन तजे ना कोय 
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{" शेष" जुलाई-सितम्बर- २०१२  में प्रकाशित }