गुरुवार, 29 नवंबर 2012


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कविता
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सच का सामना
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परछाई की तरह
मेरे साथ ही रहता है सच

कभी मेरे आगे कभी मेरे पीछे
कभी दायें कभी बाएं

कभी मेरे कद से भी
बड़ा हो जाता है सच
कभी बहुत बोना
कभी मुझ में
समा जाता है सच

झूठ डरता है सच से
सच डराता है मुझे
जब बहुत अधिक
डराता है सच
मैं भाग कर चला जाता हू
अँधेरे में
जहाँ  मेरी परछाई नहीं होती

अँधेरे में
बहुत स्पष्ट और अलौकिक
चमक लिए मिलता है सच

सच का सामना
रोशनी  में ही
किया जा सकता है
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कविता
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जो असहमत है
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विश्वास करते है
जनतांत्रिक मूल्यों में
समता, समानता और
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता  के
पक्षधर है

किन्तु सहमत नहीं हो पाते
उनसे जो असहमत है
हर विषय पर, अपने को ही
समझते है सही
चाहते है सभी सहमत हों

यदि कोई व्यक्त करता है
असहमति, वह  या तो मूर्ख होता है
या फिर दुश्मन हमारा
असहमत होने का अर्थ है
विरोध कर रहा है, वह

व्यावहारिक लोग कभी
किसी से असहमत नहीं होते
वे सहमत के साथ भी
सहमत होते है.असहमत के साथ भी

समझदार लोग
तटस्थ रहते है
चुप रहते है
सहमति,असहमति के मुद्दे पर
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{साप्ताहिक  " शुक्रवार'  29' नवम्बर' २०१२ में प्रकाशित }

शनिवार, 22 सितंबर 2012

कविता 
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सही  समय 
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सही  समय ज्ञात करना 
आसान  नहीं है 
अक्सर  हमें सही समय का 
पता  नहीं होता 

दीवारों  पर टंगी या
कलाई पर बंधी घड़ियाँ 
या तो समय से आगे होती है 
या फिर समय से पीछे 

शहर के घंटाघर की घड़ियाँ 
बंद पड़ी रहती है कई दिनों तक 
पुलिस लाइन में बजने वाले घंटों की 
आवाज़ सुनाई नहीं देती इन दिनों 

ऐसे  में सही समय  ज्ञात करना 
आसान नहीं है 
घड़ियाँ अगर सही भी चल रही हों 
तब भी ये कहना मुश्किल है 
वे समय सही बता रही है 

दरअसल समय , समय होता है 
आगे या पीछे हम होते है या घड़ियाँ 
अच्छा या बुरा जो होता है 
उसे तो होना ही है 
समय अच्छा या बुरा नहीं होता 
अच्छा या बुरा होता है जीवन 
एक ही समय में 
अनेक जीवन जी रहे होते है लोग 

समय के साथ चलता है जीवन 
चलते चलते ठहर जाता है जीवन 
समय न ठहरता है 
न  मुड कार देखता है 
मुड कर  देखता है जीवन 
समय आगे निकल जाता है 

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[ "अक्षर-पर्व " जुलाई ' २०१२ में प्रकाशित ]
 

बुधवार, 19 सितंबर 2012

कविता 
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पुरस्कार - सम्मान

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जिस तरह

पैसे और पानी का

कोई रंग नहीं होता

उसी तरह

पुरस्कार - सम्मन का भी

कोई रंग नहीं होता


पुरस्कार सम्मान

कहीं से भी मिले

ले लेना चाहिए


पुरस्कार सम्मान

लेते समय

विचार धारा को
दर किनार कर देना चाहिए

पुरस्कार-सम्मान
किसी सेठ साहूकार का हो
या अकादमी सरकार का
चाहे दे रही हो कोई विदेशी कम्पनी
अन्तोगत्वा हमारी
रचनात्मकता का सम्मान ही है

पुरस्कार -सम्मान
कंचन की तरह पवित्र होते है
कहा भी है किसी कवि ने 

परयो अपावन ठोर पर 
कंचन तजे ना कोय 
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{" शेष" जुलाई-सितम्बर- २०१२  में प्रकाशित }

बुधवार, 1 अगस्त 2012

कविता 

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स्मृति 

[ एक]

ठहरता नहीं कोई पल 

ठहरता नहीं बहता हुआ जल 

ठहरता नहीं पवन 


लौट कर नहीं आते 

पल, जल और पवन 


ठहरे रहते है शहर 

शहरों में ठहरी रहती है इमारतें 

इमारतों में ठहरी स्मृतियाँ 

स्मृतियों में  ठहरी रहती है उम्र 

उम्र में ठहरा रहता है प्रेम 


एक दिन जर्जर होकर 

ढह  जाएँगी  इमारतें 

रेत में दब जायेगें  शहर 

जीवित रहेगीं स्मृतियाँ 

स्मृतियों में जीवित रहेगा प्रेम 


प्रेम में जीवित रहेगें 

पल,जल और पवन 

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स्मृति 

[दो]

खड़ा हूँ मैं 

उस निर्जल स्थान पर 

जहाँ कभी बहता था झरना  

दूर तक सुनाई  देती थी 

जल की कल कल 


खड़ा हूँ मैं 

उस निस्पंद स्थान पर 

जहाँ हंसी बिखरते हुए 

मिली थी सांवली लड़की 


जल की कल कल में 

हंसी की खिल खिल में 

डूब गए थे मेरे शब्द 

जो कहे थे मैंने 

उस सांवली लड़की से 


खड़ा हूँ मैं 

उस निर्वाक स्थान पर 

जहाँ मौन पड़े है मेरे शब्द 


मेरे शब्द सुनने के लिए 

न झरना है 

न ही वह सांवली लड़की 

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[ ' जनसत्ता ' रविवार ,15 जुलाई 2012 के रविवारी पृष्ठ में प्रकाशित ]

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

कविता 
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डर
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जबकि कोई दुश्मन नहीं है मेरा 
फिर भी डरा हुआ रहता हूँ 
डर है कि  निकलता ही नहीं 

दिखने में तो कोई दुश्मन नहीं लगता 
फिर भी पता नहीं
मन ही मन
 किसी ने पाल रखी हो दुश्मनी 

 ये सही है कि  
 मैंने किसी का हक नहीं मारा  
 किसी कि ज़मीन जायदाद  नहीं दबाई
 किसी को अपशब्द नहीं कहे  
फिर भी मुझे शक है  
किसी भी दिन सामने आ सकता है दुश्मन  


सच और खरी खरी कहना 
हँसी   हँसी में कटाक्ष करना 
झूठी प्रशंसा नहीं करना 
इतना बहुत है 
किसी को दुश्मन बनाने के लिए 

सुझाव भी  सहजता से नहीं लेते 
आलोचना तो बिलकुल बर्दाश्त नहीं करते 
किसी भी दिन मार सकते है चाक़ू 

सोचता हूँ चुप रहूँ  
पर कुछ भी नहीं बोलने को भी 
अपमान समझते है लोग 

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कविता 
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कम-कम 
[एक]

कम-कम में भी 
कट जाता है जीवन
खुशियाँ मिली कम
प्रेम मिला कम 
लोगों के दिल में 
जगह मिली कम 

चाय में मिली 
चीनी कम 
दाल में मिला 
नमक कम 
शराब  में मिला 
पानी कम 

दोस्तों  ने निभाई 
दोस्ती  कम
दुश्मनों ने निभाई 
दुश्मनी कम 


कुछ और अच्छा 
कट जाता जीवन 
दुःख भी 
मिले होते कम 

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कम-कम 
[दो]

कम-कम ही मिले 
नहीं मिलने से बेहतर 
कम ही मिले 

सबकी हो 
आकाश में साझेदारी 
एक टुकड़ा ज़मीन का 
सबको मिले 

पीने के लायक जल मिले 
जीने के लायक वायु मिले 
कम ही मिले पर सबको 
अन्न मिले

सम्पन्नता ,वैभव और 
भव्यता पर 
चाहे रहे चंद लोगों कि
इजारेदारी 
सम्मान-स्वाभिमान का 
हक  सबको मिले 

हर घर में हो चिराग 
रोशनी चाहे कम मिले 

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[शुक्रवार साहित्य  वार्षिकी   २०१२  में प्रकाशित ]