बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

कविता

कविता 
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राशि -फल 
----------
मेरी राशि  क्या है 
मैं आज तक 
तय नहीं कर पाया 

यदि मैं जन्म दिनांक से 
राशि तय करता हूँ तो 
किस जन्म दिनांक से करूँ 
वह दिनांक जो मेरे 
हायर -सेकंडरी के प्रमाण पत्र में लिखी है 
या वह जन्म दिनांक जो माँ  बताया करती थी 
ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष  की कोई  तिथि 

यदि मैं नाम  से राशि तय करूँ 
किस नाम से तय करूँ 
वह नाम जिस नाम से 
मै  जाना जाता हूँ -या 
वह नाम जो मेरे पैदा होने के 
तत्काल  बाद रखा गया था -या 
वह नाम जो घर परिवार में 
पुकारा जाता है 

सुना था  कि 
एक जन्म पत्री  भी थी मेरी 
जिसमे मेरा नाम कुछ और है 
जन्म दिनांक कुछ और 
बचपन में मुझे कभी 
राशि देखने की जरूरत नहीं पड़ी 
जब जरूरत पड़ी 
जन्म पत्री  कही खो चुकी थी 

हर व्यावसायिक पत्र -पत्रिका में 
प्रकाशित होता है राशि-फल 
प्रति दिन - प्रति सप्ताह 
एक ही राशि  के लाखों लोगों का 
एक ही भविष्य - फल 

जिस मै बहुत हताश 
उदास - निराश होता हूँ 
पढने लगता हूँ तमाम जगह 
प्रकाशित राशि-फल 
किसी राशि से 
मेरी राशि नहीं मिलती 
किसी राशि में-फल में नहीं मिलता 
मुझे जीवन  का हल  

{ " राजस्थान सम्राट " ५ अक्टूबर' २०१३ में प्रकाशित }

कविता 
---------
मेरी राशि क्या है 
मैं आज तक 
तय नहीं कर पाया 

यदि मैं जन्म दिनांक से 
राशि तय करता हूँ तो 
किस जन्म दिनांक से करूँ 
वह दिनांक जो मेरे 
हायर सेंकडरी के प्रमाण पत्र  में लिखी है 
वह जन्म दिनांक जो माँ बताया करती थी 
ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की  कोई  तिथि 

यदि मै  नाम से  राशि तय करूँ 
किस नाम से तय करूँ 
वह नाम जिस नाम से से 
मैं जाना जाता हूँ -या 
वह नाम जो मेरे पैदा होने के 
तत्काल बाद रखा गया था -या 
वह नाम जो घर परिवार में 
पुकारा जाता है 

सुना था कि 
एक जन्म पत्री  भी थी मेरी 
जिसमे मेरा नाम कुछ और है 
जन्म दिनांक कुछ और 
बचपन में मुझे कभी 
राशि देखने की जरूरत नहीं पड़ी 
जब जरूरत पड़ी 
जन्म पत्री कहीं खो चुकी थी 

हर व्यावसायिक पत्र -पत्रिका में 
प्रकाशित होता है राशि फल 
प्रतिदिन- प्रति सप्ताह 
एक ही राशि के लाखों लोगों का 
एक ही भविष्य फल 

जिस दिन मै बहुत हताश 
उदास-निराश  होता हूँ 
पढने लगता हूँ तमाम जगह 
प्रकाशित  राशि फल 

किसी राशि से 
मेरी राशि नहीं मिलती 
किसी राशि में नहीं मिलता 
मुझे जीवन का हल

{ " राजस्थान सम्राट '  5 अक्टूबर' 2013  में प्रकाशित }

मंगलवार, 17 सितंबर 2013

तीन कविताएँ 
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   [ एक ]

आग हर चीज में लगी हुई  थी 
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पेट्रोल में ही नहीं 
आग हर चीज में लगी हुई थी 

गेहूँ, चावल, दाल , घी-तेल 
हल्दी, धनिया ,मिर्च और 
जीरे में ही नही 
नमक में भी आग लगी हुई थी 

हरी सब्जी,प्याज, लहसुन 
और टमाटर सुलग रहे थे 
फलों से उठती लपटों के पास 
खड़े रहना  तो संभव ही नहीं था 

देश में सम्पनता बढ़ी थी 
प्रति व्यक्ति आय में बढोतरी हुई थी 
एक अर्थशास्त्री  का कहना है कि 
अब किसान और मजदूर भी 
फल और सब्जी खाने लगे है 

जिनके पास अथाह घोषित सम्पति है 
और अथाह अघोषित  काला  धन 
महंगाई उन लोगों के कारण  नहीं 
महंगाई उन गरीब किसान-मजदूरों 
के कारण बढ़ी है जो अब 
फल-सब्जी ही नहीं खा रहे 
कपडे भी पहनने  लगे है 

आग वस्तुओं में ही नहीं 
पेट में भी लगी हुई थी 
हर जगह थी आग 
अगर नहीं थी आग 
तो चूल्हे में नहीं थी 
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      [दो] 
 मेरे होने का का प्रमाण पत्र 
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मैं हूँ  हाड मांस का 
एक चलता फिरता पुतला 
साँस चल रही है मेरी 
इस ही शहर  में 
रह रहा हूँ जन्म से  

मुझे हर बार 
प्रमाण देना पड़ता है 
जीवित हूँ मैं 

मुझे बार बार 
दिखाना पड़ता है 
मतदाता पहचान पत्र 
पैन कार्ड या 
ड्राइविंग लाइसेंस 

मैं रहता हूँ 
इस ही शहर में 
प्रमाणित करने के लिए 
दिखाना पड़ता है राशन कार्ड 
बिजली का बिल 
टेलीफोन का बिल 
यदि ये सब नहीं मेरे पास 
मेरे होने का कोई प्रमाण नहीं है 

जब मेरे घर में नहीं थी बिजली 
नहीं था टेलीफोन 
मेरे पास नहीं था मतदाता पहचान पत्र 
ड्राइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड 
तब भी मैं था 
मुझसे कोई नहीं मांगता था 
मेरे होने का प्रमाण पत्र 

जब मेरे पास नहीं था 
मेरे होने का प्रमाण पत्र 
शहर के बाज़ार
गलियां और चौराहे 
पहचानते थे मुझे 

बचपन में जब कभी 
भटक जाता 
मेरे पितामह का नाम बताने पर 
कोई भी मुझे छोड़ जाता था घर तक 
मेरे पितामह के पास 
कोई पहचान पत्र नहीं था 

आज यदि मेरे पास नहीं हो 
कोई पहचान पत्र 
यदि मैं नहीं बनवाता 
आधार कार्ड 
तो क्या मेरे होना 
होगा मेरे नहीं होना 

मेरे होना कोई 
महत्व नहीं रखता 
महत्वपूर्ण है 
मेरे होने का प्रमाण पत्र 
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    [तीन]
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जो अभी खोई नहीं 
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एक थैली में बंद है 
कुछ पुराने फ़ोउन्तेन पेन 
ख़राब हो चुके लाइटर 
भोंथरे नेल कटर 
जंग लगे ओपनर और की-चेन 

अब जबकि एक से एक 
उम्दा बाल पेन, जैल पेन 
रोलर पेन उपलब्ध है बाज़ार में 
मैं साधारण बाल पेन से लिखता हूँ 

पहले नए-नए  फ़ोउन्तेन पेन 
एकत्रित करने का शौक था मुझे 
मेरी थैली में आज भी रखा है 
एक चाइनीज पेन 
जिस से मैंने बी. ए.  की परीक्षा थी थी 
अब स्याही वाले फ़ोउन्तेन पेन का 
चलन नहीं रहा 
तब परीक्षा में बाल पेन से 
लिखने की अनुमति नहीं थी 

जेब में पड़ा रहता था 
एक न एक ओपनर 
पता नहीं कब बीयर की बोतल 
खोलने की जरूरत पड  जाये 
यद्पि ओपनर की अनुलब्धता पर 
कई मित्र  दांतों  से  खोल लेते थे बोतल 

जिसके  पास होता था लाइटर 
उसके सिगरेट  जलाने का 
अंदाज़ ही कुछ अलग होताथा 
मेरे पास थे कई आकृतियों में 
नए-नए की-चेन 
बहु उपयोगी नेल कटर  
उन में से बहुत सी 
वस्तुएं खो गई 
कुछ रह गई मित्रों के पास 

वर्ष में एक दो बार 
उलट-पलट कर देखता हूँ 
बची हुई वस्तुओं  को 
सोचता हूँ 
इस यूज़  एंड थ्रो के समय में 
क्या उपयोगिता है इस कबाड़ की 

बहुत देर तक 
देखते रहने के बाद 
खो जाता हूँ स्मृतियों में 
उन खोई हुई वस्तुओं की 
जो फिर कभी मिली नहीं 

एक बार फिर 
सहेज कर रख देता हूँ 
उन तमाम वस्तुओं को 
जो अभी खोई नहीं 
    -----------


['मधुमती' सितम्बर ' २०१३ में  प्रकाशित]

 

 

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

कविता 

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अन्तर्रात्मा

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दिखाई  नहीं देती
दिखाई तो
पहले भी नहीं देती थी
कहना चाहिए
सुनाई नहीं देती
इन दिनों
अन्तर्रात्मा की आवाज़

आवाजे  तो बहुत है
चीखने, चिल्लाने की
हँसने, रोने की
बहलाने, फुसलाने की
आरोप, प्रत्यारोप की
कोई स्वर ऐसा नहीं
जो जगा सके
अन्तर्रात्मा को

गायन भी बहुत है
वादन भी बहुत है
आलाप  नहीं
प्रलाप बहुत है
कोई ऐसी लहर नहीं
जो छू सके
अन्तर्रात्मा को

आत्माएं भी बहुत है
कुछ भटकती, कुछ सिसकती
कुछ आत्मलीन , कुछ मलिन
परम आत्माएं तो
बहुत मिल जाती है
अन्तर्रात्मा
कही नहीं मिलती

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प्रेम और श्रद्धा 
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मैं  लोगों से मिलने पर 
हाथ  जोड़ता हूँ, या फिर 
हाथ  मिलाता हूँ 
किसी  के गले नहीं पड़ता 
न  ही पैर पड़ता हूँ 

कई  लोगों में 
उमड़ता  प्रेम 
भींच  लेते है सीने से लगा कर 
दम घुटने लगता है 

कई लोगों में 
उमडती है श्रद्धा 
झुक  जाते है टखनों तक 
इतने कि-
शर्म  आने लगती है 

पता नहीं क्यों 
मैं जितना प्रेम करने वालों से 
डरता हूँ , उतना ही 
श्रद्धा रखने वालों से भी 
   --------------

[ ' प्रगतिशील वसुधा ' -अंक ९४ -जन- मार्च' २०१३  में प्रकाशित]

 

शुक्रवार, 14 जून 2013

कविता 
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कौवे :     तीन   कवितायेँ 
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        [  एक ]

इन दिनों शहर से
कहीं बहुत दूर 
निकल गए है  कौवे 
अब किसी घर की 
मुंडेर पर नहीं सुनाई  देती 
काँव .......    काँव .........

कौवे की काँव .. काँव 
संदेशा लाती थी 
विरहनियों  के लिए 
मेरे मुंडेरे कागा बोले 
कोई आ  रहा .........

पिया का संदेशा  लाने पर 
कौवे को लालच देती  थीं 
सोने की चोंच  मढ़ाने  का 

विरह्नियाँ कौवे   से 
व्यक्त  करती थीं व्यथा 
कागा सब तन खाइयो 
चुन चुन   खाइयो मांस 
दो नैना मत   खाइयो 
पिया मिलन  की आस 

कोवे  विरह्नियों की 
व्यथा से   व्यथित 
मुंडेर  से   उड  कर 
चले जाते  थे  सन्देशा  लाने 
        --------

         [ दो ] 

कौवे की कर्कश आवाज़ 
बदसूरत  रूप रंग  भी 
मोहक  लगता था  बच्चों को 

कौवे जब छीन कर 
ले जाते थे बच्चों के 
हाथ रोटी, तो बुरा लगता था 

कौवे  की चतुराई से 
चकित थे  बच्चे 
कौवे की  बुद्धिमत्ता  की 
कहानी  पढ़ कर 
किस तरह बर्तन के 
पैंदे में पड़े  पानी  को 
कंकड़  डाल -डाल  कर 
सतह   पर ले आया था 
प्यासा   कौवा 

पौराणिक पक्षी  कौवे की 
काग  दृष्टि के कायल थे सभी 
कौवे की काँव -काँव  से 
परेशान  होने  के  बावजूद 
कौवे  का  बोलना 
अपशगुन  का सूचक  नहीं था 

           -----------

          [ तीन ]

पता नहीं  शहर  से 
दूर  क्यों  चले  गए  कौवे 
अब  सिर्फ  श्मशान  में 
दिखाई  देते है  कौवे 

एक दिन किसी निकट  के 
रिश्तेदार  की  मृत्यु के बाद 
तीये  की क्रिया  हेतु गया था श्मशान 


पंडित जी ने 
राख के ढेर से हड्डियाँ  चुनने  के बाद 
आग  जला  कर टिकटी  के ऊपर 
चावल से भरा मिट्टी  का कलश 
रखा था  चावल  पकाने  के लिए 

पके  हुए चावल एक दोने में 
कलश  के मुंह पर रख कर 
हम प्रतीक्षा  कर रहे थे 
कौवे  के आने की  

दूर दूर  तक कहीं नहीं थे कौवे 
पंडित जी  के आह्रवान  करने पर 
दस-पंद्रह मिनट  बाद 
कहीं से उड  कर आये तीन-चार कौवे 

ठिठकते हुए कलश पर बैठ  कर 
चोंच  में चावल  दबा कर 
उड  गए  कौवे 
तीये  की क्रिया  पूरी  हो गई  थी 

मृतात्मा  के परलोक में 
पहुँच जाने का संकेत 
दे गए थे कौवे 

मै  सोच रहा था 
कितना जरूरी है 
हमारे जीवन में 
कौवे का होना 

अब जबकि 
शहर से बहुत दूर 
चले गए है 
कितने दिन नज़र आयेंगे 
श्मशान में  कोवे 

श्मशान  शहर के बीच 
आ गया है 
कौवे  चले गए है 
शहर   से  दूर 

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[  ' वागर्थ'  जून' २०१३  अंक  २ १ ५    में   प्रकाशित ]