शनिवार, 27 जून 2009

कविता

डायन



उस बुढिया के पास
जमीन का एक टुकडा शेष था
शेष था थोड़ा सा जीवन
गाँव गुम हो रहा था
बाज़ार पहुँच रहा था गाँव में

अधिकांश ग्रामवासियों ने
बेच दी अपनी जमीन
खेती छोड़ कर शेयर मार्केट में
धन लगा रहे थे
बिना मेहनत किए सम्पन्न कहला रहे थे
फ्रीज़ , वाशिंग मशीन, टी.वी ,
मोटर साइकल , और मोबाइल
जीवन का आनंद दिला रहे थे

भू माफिया की नज़र में
खटक रही थी बुढिया और
बुढिया की दो बीघा जमीन
मौके की जमीन थी ,लाखों की कीमत
बुढिया को था जमीन से प्रेम
जमीन से जुड़ी थी कई स्मृतियाँ

बुढिया गाँव भर में लोकप्रिय थी
बच्चों के बीमार होने पर
उतारती थी नज़र , करती थी झाड़ फूंक
एक दिन एक बीमार बच्चे की मौत हो गई
जिसकी नज़र उतारी थी बुढिया ने

भनक लगते ही एकत्रित हो गए
भू माफिया के लोग
जो थे अवसर की तलाश में
काना फूसी के बाद मच गया शोर
बुढिया डायन है ,खा गई बच्चे को

बुढिया का मुंह काला कर
उतार कर सारे वस्त्र
नग्न अवस्था में घुमाया गाँव में
पत्थर भी फेंके गए उस पर
जो मां थी सारे गाँव की
खड़ी थी मादरजात बेटों के सामने

इस से पहले की
पुलिस पहुँचती घटनास्थल पर
लज्जा से गडी बुढिया ने
झलांग लगा दी अंधी बावडी में

जल में समां गई उसकी लज्जा
अग्नि में जल गई उसकी देह
पर मुक्त नहीं हुई उसकी आत्मा
डायन होने के आरोप से

एक वृद्ध स्त्री की नग्न छाया
अब भी दिखाई देती है
साँझ ढले , अँधेरा उतरने पर
दो बीघा जमींन पर बने
मकानों के आसपास
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कविता

लकड़ी का संदूक
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इतना बड़ा लकड़ी का संदूक
पूरे पैर फैला कर
जिस पर सो सकता था बचपन
देख सकता था स्वप्न

एक बूढी औरत
जो उठ कर चल नहीं सकती थी
घिसट घिसट कर
बार बार आती है संदूक के पास

संदूक से उछलती है कुछ पोटलियाँ
पोटलियों में भरा है तिलस्म
एक अजीब सी गंध देते कपड़े
घिसे हुए बर्तन
गंगा जल की शीशी
न पहचान में आने वाला
पुरी के जगन्नाथ का चित्र

कई बार खुलती बंद होती पोटलियाँ
किवाडों की दरारों से
चुपचाप झांकता एक बच्चासोचता है
इस ही संदूक में है
कहीं न कहीं अल्लाद्दीन का चिराग
खुल जा सिम --सिम
बंद हो जा सिम --

संदूक में लग गई है दीमक
चाट गई सारा तिलस्म
एक झूठी कहानी साबित हुआ
अल्लाद्दीन का चिराग


अब कोई बुढिया
घिसटती हुई नहीं आती संदूक तक

बचपन आज भी
संदूक के किसी कोने में दबा है
लेकिन अब संदूक पर पूरे पैर नहीं फैलते

गुरुवार, 25 जून 2009

कविता

ख़बर
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रोशनी के अंधेरे में
खो गए थे वे लोग
जो पहले से भी कहीं
अधिक अंधेरे में जी रहे थे

नष्ट कर दिए गए थे
उनके संगठन और कारखाने
दबा दी गई थी उनकी आवाज़
अब देश काकोई भी नेता
गरीबों के पक्ष में
एक नारा भी नहीं दे रहा था

ऐसे में एक मजदूर स्त्री ने
पति की दुर्घटना में मृत्यु के बाद
स्वीकार कर ली थी पराजय
जो उसकी नहीं
देश की पराजय थी

उसके पास अन्न खरीदने लिए
फूटी कौडी भी नहीं थी
कहाँ से एकत्रितकिए होंगें पैसे
बच्चों को कैसेदिला
होगा विश्वास
जो दलिया वे खा रहें है
उसमे जीवन नहीं विष है
निश्चिंत हो जाने के बाद

कि उन रूखे सूखे शरीरों में लिया
धड़कन भी शेष नहीं है
स्वयं ने भी
पी लिया होगा विष
संघर्ष तो किया होगा मृत्यु वरण से पहले
आंसू तो नहीं सूख गए होंगें
बच्चों को विष देने से पहले

राजनीती ,फ़िल्म,क्रिकेट
बाज़ार के समाचारों ,विज्ञापनों और
अभिनेत्रियों कि कामुक तस्वीरों से
बच्ची थोडी सी जगह में समाचार पत्रों था
तीन पंक्तियों में ये समाचार

एक मजदूर स्त्री ने
गरीबी से तंग आकर
तीन बच्चों सहित पी लिया विष

आपने भी पढ़ीतो होगी ये ख़बर
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बुधवार, 24 जून 2009

कविता

बचे हुए दिन
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कितने दिन बचेगें
बचे हुए दिन
एक दिन बीत ही जायेंगे

बचे हुए दिनों में
करने को है अनेक काम
लिखना चाहता हूँ
ढेर सारी कवितायें

अभी आंखों में बचे है
कई स्वप्न
समय कम है
ताबीर के लिए

अभी जानाहै दूर
बची है थकान
समय कम है
ठहर जाने के लिए

तेजी से बीतते हुए दिन
जल्दी ही फिसल जायेगें
हथेलियों के बीच से

कितने दिन बचेगें
बचे हुए दिन
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रविवार, 21 जून 2009

कविता

छवि
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जैसा दिखना चाहता हूँ मैं
वैसा हूँ नहीं मैं
जैसा हूँ वैसा दीखता नहीं

जैसा दिखना चाहता हूँ
वैसा भी नहीं दीखता मैं

बहुत कोशिश की अपनी छवि बनाने की
वेशभूषा भीं बदली
बालों का स्टाइल भी बदलता रहा बार बार
जैसा दिखना चाहता था ,वैसा नहीं दिखा मैं

लोगों ने नहीं दखा मुझे मेरी नज़र से
लोगों ने देखा मुझे अपनी नज़र से

मैं जैसा अन्दर से हूँ ,वैसा बाहरसे नहीं हूँ
जैसा बाहर से हूँ , वसा दिखना नहीं चाहता

वैसा भी नहीं दिखना
जैसा अन्दर से हूँ मैं
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