शनिवार, 12 जुलाई 2014


कलम: तीन कवितायेँ 
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       [ एक ] 
किसी पंछी के पर को 
कभी कलम  नहीं बनाया 

सरकंडे की कलम को 
काली स्याही की दवात में 
डुबो कर, तख्ती पर 
लिखना सीखा मैंने 

कलम  कमल  कमला 
मदन   रतन    अमला 
पनघट झटपट खटपट 

गीले  अक्षरों  पर  डाल  देता 
भूरि  मिट्टी 
सूख  कर  सुन्दर हो जाते शब्द 

जब भर  जाती तख्ती 
झटपट  खटपट  सरपट से 
पूरे घर  में लिए घूमता 

शाम को मुल्तानी मिट्टी से 
पोत  कर तख्ती 
रख देता सूखने के लिए 

अगले दिन फिर लिखता 
नए शब्द 
सूरज  बादल  बिजली 
नदी  रेत   हवा    

इस तरह सीखे मैंने 
नए  नए  शब्द  लिखना 

सरकंडे की कलम से 
लिखे जा  सकते है  सुन्दर लेख 
किसी पंछी के पर  की 
कलम  से 
लिखे गए महाकाव्य 
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           [ दो ]
शब्दों के बाद के बाद कागज़ पर 
पूरे  वाक्य लिखना शुरू किया 
सरकंडे की कलम  नहीं थी 
लीड  पेन्सिल थी मेरे हाथ में 

पेन्सिल से लिखे वाक्यों को 
मिटाया जा सकता है रबर से 
पेन्सिल छीलने के लिए 
जरूरी थी एक ब्लेड या चाकू 

बच्चों के हाथ में 
नहीं दिया जा सकता चाकू 
ब्लेड की धार से कट जाती अंगुली 

बच्चों की पेँसिले 
छीला करते थे अध्यापक 
पेन्सिल से लिखे वाक्य 
उतने सुन्दर नहीं बनते थे 
जितने सुन्दर शब्द 
मैं लिख सकता था 
सरकंडे की कलम से 

जिस तरह सरकंडे की 
कलम से 
नहीं लिखे गए महाकाव्य 
पेन्सिल से  भी 
नहीं लिखी गई महागाथा 
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          [ तीन ]
मेरे हाथ में आया 
फाउन्टेन पेन, जिसे 
स्याही की दवात में 
नहीं डुबोना पड़ता था 

बहुत देर तक, बिना रुके 
लिख सकता था 
लम्बे लम्बे वाक्य 
मुझे कलम से 
प्रेम हो गया था 

घंटों लिखता रहता कागज़ पर 
जो मन में आता लिखता 
लिख कर काट देता 
फिर लिखता, फिर  काट देता 
भर जाता कागज़, फाड़ कर फेंक देता 

कितने अक्षर लिखे 
कितने काटे 
कितने कागज़ फाडे 
लिखना नहीं छोड़ा 
लिखते लिखते 
बन गई कुछ कवितायेँ 

फाउंटेन  से 
लिखी जा सकती है कवितायेँ 
बॉल पेन, जैल पेन और 
रोलर पेन से भी 
लिखी जा सकती है कवितायेँ 

महाकाव्य लिखने के लिए 
पंछी के  की 
जरूरत महसूस होती है मुझे 
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[ ' उदभावना ' अंक ११०-१११ ( मार्च'२०१४ )  प्रकाशित ]