शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

कविता

कविता 
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लेकिन   मैं   नहीं  होता 
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मैं   नहीं  लिखता   कविता  
तो  शायद   गायक   होता 
गाता   दादरा   ठुमरी   या   ग़ज़ल 

इतना    ही   असफल   होता 
जितना   कि   हूँ   कविता  में 

हो   सकता    है 
एक   असफल   चित्रकार   होता 

लेकिन   मैं   नहीं   होता 
एक   राजनीतिज्ञ 
प्रशासक   या   न्यायाधीश 

यद्पि    वहां    भी 
उतना    ही    असफल   होता 
जितना   कि     हूँ   कविता  में 

मुझे    असफल   भी   
कविता   में   ही    होना   था 

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रविवार, 10 जुलाई 2016

कविता

 कविता 
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जयपुर  छोड़  कर 
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जब  नहीं   बचा 
इलाहाबाद   में  इलाहाबाद  
लखनऊ     में   लखनऊ 
भोपाल       में   भोपाल 
पटना         में    पटना 
दिल्ली        में    दिल्ली 

तो    क्यों    जाऊं   मैं 
जयपुर   छोड़    कर  
किसी   और   शहर  में 

क्या    सिर्फ   यही   कहने 
अब    जयपुर   में   भी 
नहीं      बचा     जयपुर 
(  मेरे   काव्य  -  संग्रह   "  बची   हुई   हंसी  "  में   संकलित )

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

कविता 
सफल   व्यक्ति  वही  है 
जो  सब   कुछ  देखता  है  
आँखें   मूँद  कर 
और   तेजी  से  गुजर  जाता  है 
सब  कुछ  रौंदते   हुए  
जैसे   की  बुलडोजर 
गुजर   जाता   है  झोंपड़ियों   पर  से 
शायद   ये   जरूरत   भी   है 
एक   विकासशील    देश   की 

(   मेरी   एक    कविता   का   अंश  )

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

कविता

कविता
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 मैं न भी जानता तो क्या होता
जानता  भी  हूँ  तो  क्या  हुआ 
मुझे  इस  यात्रा  में शामिल  होना था 
और  मैं  हो  गया 
ये  सब  ऐसे  ही हुआ 
जैसे  मेरा  जन्म  हो गया 
ये  बात  और  है  कि 
मैं  किसी  से  साथ हीं  चल  सका 
इसलिए  नहीं  की  सभी  लोग 
बेईमान  या  भ्र्ष्ट  है या कि 
लोगों  ने  ही  मुझे  छोड़  दिया 
कारण  चाहे  कुछ भी  रहा हो 
इस  लम्बी  यात्रा  में मुझे 
अकेला  ही  होना  था 
कुछ बहुत  दूर  तक साथ चल कर 
मुड़  गए  सुख - सुविधा  की  गली में 
मैं  पांव  के  कांटे  निकाल  कर  
अकेला  ही  चलता  रहा जा  रहा हूँ
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शनिवार, 2 जुलाई 2016

[▶ Govind Mathur recites his poems by Durgaprasad] is good,have a look at it! https://m.soundcloud.com/durgaprasad-2/govind-mathur-recites-his-poems