शनिवार, 13 मई 2017

https://www.youtube.com/watch?v=nNS6Ldh-zIA&feature=youtube_gdata_player

शनिवार, 6 मई 2017

कविता

कविता 
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छाया 
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धूप  में  झुलसता  रहा 
जीवन भर 
छाया  कभी  मिली नहीं 

भीगा  कुछ देर 
बरसात  में भी 
धूप  खिली  रही 

छाया  तो  दूर  ही  रही 
मुझ  से  यहाँ तक कि 
अपनी  छाया  भी 
कभी  दिखी  नहीं 
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( "परिकथा"  मई - जून ' 2017  में  प्रकाशित  )

कविता

कविता
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आकाश 
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हर व्यक्ति के सिर पर 
एक आकाश होता है 
चाहे बहुत दूर होता है 

आकाश है ये महसूस करने पर 
सहारा बना रहता है 

होते तो और भी कई सहारे हैं 
किन्तु वे कभी भी 
छोड़ कर जा सकते हैं 

जैसे पहाड़ टूट कर गिर सकते हैं 
बिजली कड़क कर गिर सकती है 
बादल गरज कर बरस सकते हैं 

आकाश सिर्फ मुहावरे में गिरता है 

आकाश के सिर पर रहने से 
भरोसा नहीं टूटता। 

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( "परिकथा" मई - जून ' 2017  में   प्रकाशित )


कविता


कविता 
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नीला
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मुझे नीला रंग 
पहले भी अच्छा लगता था 
आज भी मुझे नीला रंग 
आकर्षित करता है 

इसलिए नहीं कि 
आकाश का रंग नीला होता है 

इसलिए भी नहीं कि 
झील का पानी नीला दीखता है 

इसलिए तो बिलकुल नहीं कि 
मुझे नीली आँखों से प्रेम है 

मुझे नीला रंग इसलिए पसंद है 
मैं पहले भी उदास  रहता था 
आज भी उदास रहता हूँ 

और इसलिए भी कि
रक्त  का रंग नीला नहीं होता 
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( " परिकथा " मई - जून' 2017 में प्रकाशित )

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

कविता

कविता
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खिलौना खरीदने  से पहले 
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बार बार मेरे हाथ जाते हैं 
कभी भालू  की पीठ पर 
कभी बन्दर को नाक पर 
लौट आते हैं तेजी से 
जैसे किसी ने  गड़ा  दिए  हों  नुकीले दांत 
मैं कुछ झेंप  कर  पूछने लगता हूँ 
एरोप्लेन  या  हैलीकॉप्टर  के दाम 
मेरे सामने   खिलौनों  की अदभुत  दुनिया 
सोती जागती   गुड़िया  है 
मेरे  ख्यालों   में  एक बच्चा  है  - जिसने 
फरमाइश  की थी  एक   गन   की 
अपने  दोनों  हाथ  जेब  में  डाल  कर 
दुकानदार  की और देख , खिलौनों  के  दाम  सुन मुझे भी भी जरुरत महसूस होती है एक गन की
खिलौना   खरीदने   से  पहले 
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(  काव्य - संग्रह   "  दीवारों  के पार  कितनी  धूप " 
   वर्ष ' 1991   से एक कविता  )

मंगलवार, 21 मार्च 2017

कविता

कविता 
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कवि और समाज 
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कुछ भी नहीं बदलता 
एक कवि के चले जाने से 
कवि जो करता था 
समाज को बदलने की बात 
बदल नहीं पाया था स्वयं को भी 
कवि जानता था उसकी कविता 
बदल नहीं सकती समाज को न दुनिया को 

कवि के चले जाने से खाली हो जाती है 
 एककुर्सी,सूनी हो जाती हैएक मेज।उदासजाती हैं कुछ किताबें
कवि के चले से जाने से भर आते हैं 
जिनकी आँखों में आंसू 
बिछुड़ जाने का जिनको होता है दुःख 
 वे कवि  आत्मीयजन होते हैं 
जिनके लिए वह कवि नहीं होता 

कवि का चले जाना समाचार नहीं बनता 
चुपचाप चला जाता है कवि जैसे कोई गया ही न हो 
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बुधवार, 8 मार्च 2017

कविता

कविता 
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जली हुई  देह 
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वह स्त्री पवित्र अग्नि की लौ से 
गुज़र कर आई उस घर में 
उसकी देह से फूटती रोशनी 
समा गई घर की दीवारों में 
दरवाजों और खिड़कियों में 
उसने घर की हर वस्तु कपडे, बिस्तर,बर्तन 
यहाँ तक की झाड़ू को भी दी अपनी उज्ज्वलता 
दाल,अचार, रोटियों को दी अपनी महक 
उसकी नींद,प्यास,भूख और थकन 
विलुप्त हो गई एक पुरुष की देह में 
पवित्र अग्नि की लौ से गुज़र कर आईं 
स्त्री को एक दिन लौट दिया अग्नि को 
जिस स्त्री ने पहचान दी घर को 
उस स्त्री की कोई पहचान नहीं थी 
जली  हुई देह थी एक स्त्री की 
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शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

कविता

कविता 
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तस्वीरों  से झांकते  पुराने  मित्र 
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श्वेत  श्याम  तस्वीरों  में अभी 
मौजूद है  पुराने मित्र 
गले में  बाहें डाले या कंधे पर कुहनी टिकाये 
तस्वीर देख कर नहीं लगता बरसों से  नहीं मिले होंगें 
ये मासूम से  दिखने वाले पतले - दुबले  छोकरे
तस्वीरों   बाहर मिलना नहीं होता पुराने  मित्रों से
कुछ एक को तो  देखे हुए  भी 
पंद्रह बीस साल गुज़र गए 
एक ही शहर  में  रहते  हुए भी 
अचकचा गया एक दिन अजमेरी गेट पर 
 अंडे खरीद ते हुए 
एक  मोटे आदमी  को देख कर 
प्रमोद हंस रहा था मुझे पहचान  कर 
महानगर  होते  नगर में ऐसा कभी ही होता है कि 
कोई  आप को पहचान रहा हो 
ये सोच कर उदास हो जाता है मन 
जिन मित्रों  के साथ जमती थी महफ़िल
 मिलते थे हर रोज़ 
घंटों खड़े  रहा करते थे चौराहे पर वे बचपन के मित्र 
जीवन से निकल कर तस्वीरों  में रह गए हैं 
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गुरुवार, 5 जनवरी 2017

कविता

कविता 
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काम  से लौटती  स्त्रियां 
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जिस तरह हवाओं में लौटती है खुशबू 
पेड़ों पर लौटती हैं चिड़ियाँ 
शाम को घरों को लौटती है काम पर गई स्त्रियां 

उदास बच्चों के लिए टाफियां 
उदासीन पतियों के लिए सिगरेट के पैकिट खरीदती 
शाम को घरों को लौटती है काम पर गई स्त्रियां  

काम पर गई स्त्रियों के साथ 
घरों में लौटता है घरेलूपन  
चूल्हों में लौटती है आग 
दीयों में लौटती हैं रोशनी 
बच्चों में लौटती है हंसी 
पुरुषों में लौटता है पौरुष 

आकाश अपनी जगह दिखाई देता है 
पृथ्वी घूमती है धूरी पर 
शाम को घरों को लौटती हैं काम पर गई स्त्रियां 
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बुधवार, 14 दिसंबर 2016

कविता

कविता 
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कम - कम 
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कम कम में भी 
कट जाता है जीवन

खुशियां मिली कम 
प्रेम मिला कम 
लोगों के दिल में 
जगह मिली कम 

चाय में मिली चीनी कम 
दाल में मिला नमक कम 
शराब में मिला पानी काम 

दोस्तों ने निभाई दोस्ती कम 
दुश्मनों ने निभाई दुश्मनी कम 

कुछ और अच्छा कट जाता जीवन 
दुःख भी मिले होते कम 
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सोमवार, 28 नवंबर 2016

कविता

कविता 
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रास्ते 
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उन्ही  रास्तों  पर  चला  मैं 
जो  थे  लंबे  और  ऊबड़ - खाबड़ 
शार्ट - कट  नहीं  ढूंढें   मैंने

अभी  मंज़िल  दूर  थी 
चल  ही  रहा  था  मैं  

कुछ  लोग  लौटते  हुए  मिले
सही  राह  की  तलाश  में 
बहुत   कम   थे 

अधिकांश  शार्ट - कट  से 
पहुँच   गए  थे  गन्तव्य  तक 
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शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

कविता

कविता 
यहाँ  एक  नगर  था  

यहाँ  एक  नगर  था 
कुछ  आदमी  रहा  करते  थे 
कुछ  औरतें  गुनगुनाया  करती  थी 
कुछ  बच्चे  खिलखिलाया  करते  थे 

इधर  इस  मोड़  पर एक चौक  था 
घरों  के  बाहर  चबूतरे  थे 
जहाँ  घंटों  बैठक  जमा  करती  थी 
ताश  और  चौसर  चला  करती  थी 
एक  पेड़  था  जिसकी  छाँव  में 
धूप  सुस्ताया  करती  थी 

दीवारों  पर  चित्र  हुआ  करते  थे 
हाथी  घोडा  पालकी  जय  कन्हैया  लाल  की 
एक  खामोश  गीत  सुनाई  पड़ता  था 
जिसे  ख़ामोशी  खुद  सुनाया  करती  थी 

उधर  उस  मोड़  पर  हाट  था 
ये  पूरा  नगर  का  नगर  कैसे  बाजार  हो  गया 
ये  इतने  दूकानदार  किस  देश - विदेश  से  आये  हैं 
यहाँ  एक  नगर  था  उस  नगर  का  क्या  हुआ 
                                                                                                 

बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

कविता

कविता 
नींद  में   स्री 

कई  हज़ार  वर्षों   से 
नींद  में   जाग   रही   है   स्री 
नींद   में   भर    रही   है   पानी 
नींद   में    बना   रही  है   व्यंजन 
नींद   में     बच्चों   को  
खिला  रही   है   दाल   चावल 

पूरे   परिवार   के  कपडे   धोते   हुए 
झूठे   बर्तन   साफ़   करते  हुए  
थकती   नहीं   स्त्री 
हजारों   मील   नींद   में  चलते   हुए 

जब  पूरा  परिवार 
सो  जाता  है  संतुष्ट  हो कर 
तब  अँधेरे  में 
अकेली   बिलकुल   अकेली 
नींद  में  जागती   रहती   है   स्त्री  

कई   हजार  वर्षों  से 
नींद   में    कर   रही   है   प्रेम 
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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

कविता

कविता 
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सत्य   का     चेहरा 
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सत्य  का  एक  चेहरा  होता  है 
रंगहीन   भी   नहीं   होता   सत्य 
लेकिन   झूठ  की  तरह  हर  कहीं 
नहीं   पाया   जाता 
न  ही  झूठ  में  घुल  पता  है   सत्य
अगर   होता  है  कहीं .
अलग   से   दिव्य  आलोक लिए 
दमकता  रहता है   सत्य 

कुछ   लोग    निरन्तर 
सत्य   की  खोज  में 
भटक   रहे  हैं   आज  भी 
जबकि  कुछ  लोग  दावा  कर  रहे  हैं 
उन्होंने  खोज  लिया   है   सत्य 
जिसे  वे  सत्य  कह  रहे  हैं 
हजार  बार  बोला  गया  झूठ  है 
रगड़   रगड़   कर पैदा  की  गई   चमक  है 
वे  आनंदित  प्रमुदित  हैं  अपनी खोज  पर  
उन्होंने  पा  लिया  है   सत्य   का   रहस्य 

हे   ईश्वर 
उन्हें  बता   कि    सत्य   क्या  है. 

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

कविता

पितृ  पक्ष 
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उनको नहीं देखा मैंने 
उनकी कोई स्मृति भी नहीं 
बहुत पहले ही चले गए थे 
मेरे जन्म के कुछ ही बाद 
मेरे बचपन से भी पहले 
फिर भी एक अहसास 
न होने  का,एक अमूर्त 
आकृति मंडराती रही मेरे आस पास 
दोनों हाथों की अंजुरी बना कर 
पृथ्वी पर  जल छोड़ता  हूँ 
आह्वान करता हूँ 
श्राद्ध पक्ष में अपने पुरखों का 
और उनका भी जो मेरे पिता थे 
जिनकी  जगह खाली रही जीवन में 
जिनकी अंगुली 
पकड़ कर नहीं चला मैं 
               -------
( मेरे चतुर्थ काव्य -संग्रह "बची हुई हंसी " से  )


              

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

कविता

कविता 
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एक ही नगर में
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एक ही नगर में  रहते  हैं  पांच  कवि 
खूब   प्रकाशित   होते  हैं 
साहित्यिक  पत्रिकाओं  में 
दूसरे  नगर  से  देखने  पर 
समृद्ध  लगता  है  ये  नगर 

एक  ही नगर  में  रहते  हुए 
एक  कवि  को  दूसरे  कवि  की  खबर  नहीं हैं 
पहला  कवि  नहीं  जानता  दूसरे  कवि  ने 
बदल  लिया  है  मकान 
दूसरा  कवि  नहीं  जानता  तीसरा  कवि 
भर्ती  है  अस्पताल  में 
चौथा  कवि  किसी  अन्य  को 
कवि   नहीं   मानता 
पांचवां  कवि  अब  भी  कभी  कभी 
जाता  है   कॉफी   हाउस 

पांचों  कवि   मिलते  हैं अपने  ही  नगर  में 
किसी  साहित्यिक  समारोह  में 
जिसमें  मुख्य  अतिथि  होते   हैं 
राजधानी  से  आये  नामवर  आलोचक 

अपने  ही  नगर  में  पांचों  कवि 
इस  तरह  मिलते  है  गले 
मिले  हों  वर्षों  बाद 
जैसे   आये  हों  दूसरे  नगरों  से 
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सोमवार, 12 सितंबर 2016

कविता

कविता 
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शून्य  में 
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कई   बार   शून्य   में 
चला  जाता    हूँ    मैं 

एक  बेहद  लंबी  
सैकड़ों    मील   दूर   तक   फैली   सुरंग 
जिसमें   न    हवा    है   न   ही   जल 
कहीं   कोई   प्रकाश   छिद्र   भी   नहीं 
निस्तब्ध   निर्वाक   अपने   क़दमों   की 
पदचाप   भी   सुनाई   नहीं    देती 

जहाँ   न   शब्द   है   
न    ही   शब्दों   के   अर्थ  
न   ही   शब्दों   के   बीच   छूटी   खाली   जगह 

एक    निराकार 
ध्यानस्थ    भारहीन 
रूई   के   फाहे   सा 
तैरता   रहता   हूँ   शून्य   में 
किसी   गहन   अँधेरे    में 

फिर    लौटना   नहीं   चाहता 
कोलाहल  में 
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(  काव्य  -- संग्रह   "  बची   हुई   हंसी   "  से   एक  कविता  )


सोमवार, 5 सितंबर 2016

कविता

कविता 
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उदास  दिनों  में 
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अपने  सबसे  उदास   दिनों   में  भी 
इतना   उदास  नहीं  था   मैं  

तब   उदास  होने   के  लिए 
कुछ  भी  जरूरी  नहीं  था 

पेड़ों   से   झर   रहे   हो   पत्ते   तो 
उदास   हो  जाया  करता   था   
मेघों   से   टपक   रही   हों   बूंदें 
तो  उदास   हो  जाया  करता  था 

मेरे   सबसे   उदास   दिनों  में 
इतने   बुरे   नहीं  थे   लोग 
अपने   सबसे   बुरे  दिनों   में 
सबसे   अच्छे   मित्रों   के   साथ   रहा   मैं 

पृथ्वी   के  सबसे   उदास   दिनों  में   भी 
सबसे    अच्छे   मित्रों   के  साथ 
रहना   चाहता   हूँ  मैं 
                  --------------
(  काव्य  -  संग्रह   "  उदाहरण   के  लिए   आदमी  "  से  )

सोमवार, 22 अगस्त 2016

कविता

कविता :  बातें 
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कभी  हमारे  पास 
इतनी  बातें    थीं  कि -
ख़त्म   ही  नहीं  होती  
प्रहरों   बातें  करते  हुए  
चौराहे  पर   खड़े  रहते 
अपने  अपने  घर  पहुँचने के 
बाद    याद    आता  कि  -
वो  बात  तो  कही ही  नहीं 
जो  बात  करने  घर  से  निकले  थे 
अब  मिलते  हैं  तो  करने  के  लिए 
कोई  बात  नहीं  होती  
करने  के  लिए  वो  बात  करते  हैं 
जो  बात  ही  नहीं  होती 
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शनिवार, 6 अगस्त 2016

कविता

कविता 
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उम्मीद
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पहले  मुझे  उसकी  कभी 
प्रतीक्षा  नहीं  करनी  पड़ी 
क्योकि  वह   वहां 
पहले  से मौजूद  रहता  था 
जहाँ   मुझे  
उसकी   अपेक्षा   होती 

मुझे  अब भी उसकी 
प्रतीक्षा  नहीं  करनी  पड़ती 
क्योकि  वह  वहां  नहीं  आएगा 
जहाँ   मुझे  उसकी  अपेक्षा  तो  है 
पर  उम्मीद  नहीं   है 
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गुरुवार, 4 अगस्त 2016

कविता

कविता 
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अपने शहर में 
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सदी के मध्य में 
पृथ्वी पर  आया 
पचास वर्ष लग गए 
परिवेश को समझने में 

भूगोल अभी समझ 
नहीं आया 
नदियां समुद्र पहाड़ 
रेगिस्तान भी देखा 
खो गया घने जंगलों में 

चकित हुआ सूर्य और 
चन्द्रमा देख कर 
वर्षों निहारता रहा आकाश 

पहचान नहीं पाया 
अपने ही शहर के रास्ते 

रोज़ पूछता हूँ घर का रास्ता 
पूछ कर भटक जाता हूँ 
अपने ही शहर में 
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

कविता

कविता 
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लेकिन   मैं   नहीं  होता 
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मैं   नहीं  लिखता   कविता  
तो  शायद   गायक   होता 
गाता   दादरा   ठुमरी   या   ग़ज़ल 

इतना    ही   असफल   होता 
जितना   कि   हूँ   कविता  में 

हो   सकता    है 
एक   असफल   चित्रकार   होता 

लेकिन   मैं   नहीं   होता 
एक   राजनीतिज्ञ 
प्रशासक   या   न्यायाधीश 

यद्पि    वहां    भी 
उतना    ही    असफल   होता 
जितना   कि     हूँ   कविता  में 

मुझे    असफल   भी   
कविता   में   ही    होना   था 

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