मंगलवार, 20 सितंबर 2016

कविता

पितृ  पक्ष 
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उनको नहीं देखा मैंने 
उनकी कोई स्मृति भी नहीं 
बहुत पहले ही चले गए थे 
मेरे जन्म के कुछ ही बाद 
मेरे बचपन से भी पहले 
फिर भी एक अहसास 
न होने  का,एक अमूर्त 
आकृति मंडराती रही मेरे आस पास 
दोनों हाथों की अंजुरी बना कर 
पृथ्वी पर  जल छोड़ता  हूँ 
आह्वान करता हूँ 
श्राद्ध पक्ष में अपने पुरखों का 
और उनका भी जो मेरे पिता थे 
जिनकी  जगह खाली रही जीवन में 
जिनकी अंगुली 
पकड़ कर नहीं चला मैं 
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( मेरे चतुर्थ काव्य -संग्रह "बची हुई हंसी " से  )


              

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

कविता

कविता 
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एक ही नगर में
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एक ही नगर में  रहते  हैं  पांच  कवि 
खूब   प्रकाशित   होते  हैं 
साहित्यिक  पत्रिकाओं  में 
दूसरे  नगर  से  देखने  पर 
समृद्ध  लगता  है  ये  नगर 

एक  ही नगर  में  रहते  हुए 
एक  कवि  को  दूसरे  कवि  की  खबर  नहीं हैं 
पहला  कवि  नहीं  जानता  दूसरे  कवि  ने 
बदल  लिया  है  मकान 
दूसरा  कवि  नहीं  जानता  तीसरा  कवि 
भर्ती  है  अस्पताल  में 
चौथा  कवि  किसी  अन्य  को 
कवि   नहीं   मानता 
पांचवां  कवि  अब  भी  कभी  कभी 
जाता  है   कॉफी   हाउस 

पांचों  कवि   मिलते  हैं अपने  ही  नगर  में 
किसी  साहित्यिक  समारोह  में 
जिसमें  मुख्य  अतिथि  होते   हैं 
राजधानी  से  आये  नामवर  आलोचक 

अपने  ही  नगर  में  पांचों  कवि 
इस  तरह  मिलते  है  गले 
मिले  हों  वर्षों  बाद 
जैसे   आये  हों  दूसरे  नगरों  से 
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सोमवार, 12 सितंबर 2016

कविता

कविता 
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शून्य  में 
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कई   बार   शून्य   में 
चला  जाता    हूँ    मैं 

एक  बेहद  लंबी  
सैकड़ों    मील   दूर   तक   फैली   सुरंग 
जिसमें   न    हवा    है   न   ही   जल 
कहीं   कोई   प्रकाश   छिद्र   भी   नहीं 
निस्तब्ध   निर्वाक   अपने   क़दमों   की 
पदचाप   भी   सुनाई   नहीं    देती 

जहाँ   न   शब्द   है   
न    ही   शब्दों   के   अर्थ  
न   ही   शब्दों   के   बीच   छूटी   खाली   जगह 

एक    निराकार 
ध्यानस्थ    भारहीन 
रूई   के   फाहे   सा 
तैरता   रहता   हूँ   शून्य   में 
किसी   गहन   अँधेरे    में 

फिर    लौटना   नहीं   चाहता 
कोलाहल  में 
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(  काव्य  -- संग्रह   "  बची   हुई   हंसी   "  से   एक  कविता  )


सोमवार, 5 सितंबर 2016

कविता

कविता 
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उदास  दिनों  में 
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अपने  सबसे  उदास   दिनों   में  भी 
इतना   उदास  नहीं  था   मैं  

तब   उदास  होने   के  लिए 
कुछ  भी  जरूरी  नहीं  था 

पेड़ों   से   झर   रहे   हो   पत्ते   तो 
उदास   हो  जाया  करता   था   
मेघों   से   टपक   रही   हों   बूंदें 
तो  उदास   हो  जाया  करता  था 

मेरे   सबसे   उदास   दिनों  में 
इतने   बुरे   नहीं  थे   लोग 
अपने   सबसे   बुरे  दिनों   में 
सबसे   अच्छे   मित्रों   के   साथ   रहा   मैं 

पृथ्वी   के  सबसे   उदास   दिनों  में   भी 
सबसे    अच्छे   मित्रों   के  साथ 
रहना   चाहता   हूँ  मैं 
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(  काव्य  -  संग्रह   "  उदाहरण   के  लिए   आदमी  "  से  )