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शनिवार, 21 नवम्बर 2009

कविता 
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पिता 
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सर्दियों की ठिठुरती सुबह में 
मेरा पुराना कोट पहने 
सिकुड़े हुए कही दूर से 
दूध लेकर आते है पिता 


दरवाजे पर उकडू से बैठे 
बीडी पीते हुए 
मुझे आता देख 
हड़बड़ी में 
खड़े हो जाते है पिता 


सारा दिन निरीहता से 
चारों तरफ देखते 
चारपाई बैठे खांसते 
मुझे देख कर चौंक उठते है पिता


मैं कभी भी 
उनके पैर नहीं छूता 
कभी हाल नहीं पूछता 
जीता हूँ एक दूरी 
महसूसता हूँ 
उनका होना  
सोचता हूँ 
यह कब से हुआ पिता 
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3 टिप्पणियाँ:

  1. बहुत सुन्दर और जीवंत रचना
    दृष्य साकार हो उठते है.

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं
  2. झंझोर दिया आपके इन लफ़्ज़ों ने ..पर आज का सच यही है अधिकतर ..

    प्रत्‍युत्तर देंहटाएं