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सोमवार, 7 दिसम्बर 2009

कविता 
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बचा हुआ  स्वाद 
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जीभ का भूला हुआ स्वाद 
जीभ पर नहीं है 
सुरक्षित है मेरी स्मृति  में

न रोटियों में 
न दाल में 
न अचार  में 
बचा है स्वाद 
मेरी स्मृतियों  में 


बचाए रखना चाहता  हूँ 
थोड़ी सी महक 
थोड़ी सी गंध 
थोड़ी सी भूख 
थोड़ी सी प्यास 
अपनी स्मृतियों में


बचाए रखना चाहता हूँ 
खाली पेट देखे स्वप्न 
खट्टे मीठे फालसों 
काली जामुन और 
लाल बेर का रंग 
मुंह में आया पानी 
और बचा हुआ स्वाद 
अपनी स्मृतियों   में.
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1 टिप्पणियाँ:

  1. kavita bacha huya svaad,achchi lagi.hamaari smritoyon me bahut si bate hai aapne kavita me jo kaha hai usase kahi adhik ankaha prakat ho gaya hai badhi.

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