बुधवार, 12 अक्तूबर 2016

कविता

कविता 
नींद  में   स्री 

कई  हज़ार  वर्षों   से 
नींद  में   जाग   रही   है   स्री 
नींद   में   भर    रही   है   पानी 
नींद   में    बना   रही  है   व्यंजन 
नींद   में     बच्चों   को  
खिला  रही   है   दाल   चावल 

पूरे   परिवार   के  कपडे   धोते   हुए 
झूठे   बर्तन   साफ़   करते  हुए  
थकती   नहीं   स्त्री 
हजारों   मील   नींद   में  चलते   हुए 

जब  पूरा  परिवार 
सो  जाता  है  संतुष्ट  हो कर 
तब  अँधेरे  में 
अकेली   बिलकुल   अकेली 
नींद  में  जागती   रहती   है   स्त्री  

कई   हजार  वर्षों  से 
नींद   में    कर   रही   है   प्रेम 
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