कविता
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अक्सर हम भूल जाते है
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अक्सर हम भूल जाते हैं चाबियाँ
जो किसी खजाने की नहीं होती
अक्सर रह जाता है हमारा कलम
किसी अनजान के पास
जिससे वह नहीं लिखेगा कविता
अक्सर हम भूल जाते हैं
उन मित्रों के टेलीफ़ोन नंबर
जिनसे हम रोज मिलते है
डायरी में मिलते है
उन के टेलीफोन नंबर
जिन्हें हम कभी फ़ोन नहीं करते
अक्सर हम भूल जाते हैं
रिश्तेदारों के बदले हुए पते
याद रहती है रिश्तेदारी
अक्सर याद नहीं रहते
पुरानी अभिनेत्रियों के नाम
याद रहते है उनके चेहरे
अक्सर हम भूल जाते हैं
पत्नियों द्वारा बताये काम
याद रहती है बच्चों की फरमाइश
हम किसी दिन नहीं भूलते
सुबह दफ्तर जाना
शाम को बुद्धुओं की तरह
घर लौट आना
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शनिवार, 27 फरवरी 2010
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वाह!
प्रत्युत्तर देंहटाएंas always, many emotions in one poem!
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