रविवार, 21 जून 2009

कविता

छवि
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जैसा दिखना चाहता हूँ मैं
वैसा हूँ नहीं मैं
जैसा हूँ वैसा दीखता नहीं

जैसा दिखना चाहता हूँ
वैसा भी नहीं दीखता मैं

बहुत कोशिश की अपनी छवि बनाने की
वेशभूषा भीं बदली
बालों का स्टाइल भी बदलता रहा बार बार
जैसा दिखना चाहता था ,वैसा नहीं दिखा मैं

लोगों ने नहीं दखा मुझे मेरी नज़र से
लोगों ने देखा मुझे अपनी नज़र से

मैं जैसा अन्दर से हूँ ,वैसा बाहरसे नहीं हूँ
जैसा बाहर से हूँ , वसा दिखना नहीं चाहता

वैसा भी नहीं दिखना
जैसा अन्दर से हूँ मैं
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