बुधवार, 30 दिसंबर 2015

बिखरा हुआ जीवन

कविता 
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बिखरा हुआ जीवन
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एक दिन मुझे 
ख्याल आया 
अब सिमेट लेना चाहिए 

इधर -उधर देखा 
कुछ  भी नहीं था 
सिमेट लेने के लिए 
कुछ पत्र - पत्रिकाओं 
और पुस्तकों के अतिरिक्त 
जो बिखरी हुई थीं मेरे बाहर 

मैं तो सिमटा हुआ ही रहा 
कभी फैलाया नहीं स्वयं को 
अपने से बाहर 

सिमटते -सिमटते 
इतना सिकुड़ गया कि -
सिलवटें पड़ गईं 

जीवन में कभी 
दौड़ नहीं लगाई 
धीमें धीमें ही चलता  रहा 

सिमटा - सिकुड़ा 
कछुए  से सा जीवन जिया मैंने 

फिर न जाने क्यों 
मुझे ख्याल आया 
अब सिमेट लेना चाहिए 

एक बार और 
इधर- उधर देखा 
देखा अपने अंदर 
सिमटते - सिमटते भी 
कितना बिखर गया था 

इतना बिखरा था जीवन 
सिमेटा नहीं जा सकता था. 
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( राजस्थान पत्रिका, जयपुर। रविवार' २७दिस्म्बर' २०१५ में पकाशित )