बुधवार, 12 अक्टूबर 2016

नींद में स्त्री

कविता 
नींद  में   स्री 

कई  हज़ार  वर्षों   से 
नींद  में   जाग   रही   है   स्री 
नींद   में   भर    रही   है   पानी 
नींद   में    बना   रही  है   व्यंजन 
नींद   में     बच्चों   को  
खिला  रही   है   दाल   चावल 

पूरे   परिवार   के  कपडे   धोते   हुए 
झूठे   बर्तन   साफ़   करते  हुए  
थकती   नहीं   स्त्री 
हजारों   मील   नींद   में  चलते   हुए 

जब  पूरा  परिवार 
सो  जाता  है  संतुष्ट  हो कर 
तब  अँधेरे  में 
अकेली   बिलकुल   अकेली 
नींद  में  जागती   रहती   है   स्त्री  

कई   हजार  वर्षों  से 
नींद   में    कर   रही   है   प्रेम 
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शुक्रवार, 7 अक्टूबर 2016

सत्य का चेहरा

कविता 
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सत्य   का     चेहरा 
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सत्य  का  एक  चेहरा  होता  है 
रंगहीन   भी   नहीं   होता   सत्य 
लेकिन   झूठ  की  तरह  हर  कहीं 
नहीं   पाया   जाता 
न  ही  झूठ  में  घुल  पता  है   सत्य
अगर   होता  है  कहीं .
अलग   से   दिव्य  आलोक लिए 
दमकता  रहता है   सत्य 

कुछ   लोग    निरन्तर 
सत्य   की  खोज  में 
भटक   रहे  हैं   आज  भी 
जबकि  कुछ  लोग  दावा  कर  रहे  हैं 
उन्होंने  खोज  लिया   है   सत्य 
जिसे  वे  सत्य  कह  रहे  हैं 
हजार  बार  बोला  गया  झूठ  है 
रगड़   रगड़   कर पैदा  की  गई   चमक  है 
वे  आनंदित  प्रमुदित  हैं  अपनी खोज  पर  
उन्होंने  पा  लिया  है   सत्य   का   रहस्य 

हे   ईश्वर 
उन्हें  बता   कि    सत्य   क्या  है. 

मंगलवार, 20 सितंबर 2016

पितृ पक्ष

पितृ  पक्ष 
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उनको नहीं देखा मैंने 
उनकी कोई स्मृति भी नहीं 
बहुत पहले ही चले गए थे 
मेरे जन्म के कुछ ही बाद 
मेरे बचपन से भी पहले 
फिर भी एक अहसास 
न होने  का,एक अमूर्त 
आकृति मंडराती रही मेरे आस पास 
दोनों हाथों की अंजुरी बना कर 
पृथ्वी पर  जल छोड़ता  हूँ 
आह्वान करता हूँ 
श्राद्ध पक्ष में अपने पुरखों का 
और उनका भी जो मेरे पिता थे 
जिनकी  जगह खाली रही जीवन में 
जिनकी अंगुली 
पकड़ कर नहीं चला मैं 
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( मेरे चतुर्थ काव्य -संग्रह "बची हुई हंसी " से  )


              

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

एक ही नगर में

कविता 
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एक ही नगर में
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एक ही नगर में  रहते  हैं  पांच  कवि 
खूब   प्रकाशित   होते  हैं 
साहित्यिक  पत्रिकाओं  में 
दूसरे  नगर  से  देखने  पर 
समृद्ध  लगता  है  ये  नगर 

एक  ही नगर  में  रहते  हुए 
एक  कवि  को  दूसरे  कवि  की  खबर  नहीं हैं 
पहला  कवि  नहीं  जानता  दूसरे  कवि  ने 
बदल  लिया  है  मकान 
दूसरा  कवि  नहीं  जानता  तीसरा  कवि 
भर्ती  है  अस्पताल  में 
चौथा  कवि  किसी  अन्य  को 
कवि   नहीं   मानता 
पांचवां  कवि  अब  भी  कभी  कभी 
जाता  है   कॉफी   हाउस 

पांचों  कवि   मिलते  हैं अपने  ही  नगर  में 
किसी  साहित्यिक  समारोह  में 
जिसमें  मुख्य  अतिथि  होते   हैं 
राजधानी  से  आये  नामवर  आलोचक 

अपने  ही  नगर  में  पांचों  कवि 
इस  तरह  मिलते  है  गले 
मिले  हों  वर्षों  बाद 
जैसे   आये  हों  दूसरे  नगरों  से 
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सोमवार, 12 सितंबर 2016

शून्य में

कविता 
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शून्य  में 
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कई   बार   शून्य   में 
चला  जाता    हूँ    मैं 

एक  बेहद  लंबी  
सैकड़ों    मील   दूर   तक   फैली   सुरंग 
जिसमें   न    हवा    है   न   ही   जल 
कहीं   कोई   प्रकाश   छिद्र   भी   नहीं 
निस्तब्ध   निर्वाक   अपने   क़दमों   की 
पदचाप   भी   सुनाई   नहीं    देती 

जहाँ   न   शब्द   है   
न    ही   शब्दों   के   अर्थ  
न   ही   शब्दों   के   बीच   छूटी   खाली   जगह 

एक    निराकार 
ध्यानस्थ    भारहीन 
रूई   के   फाहे   सा 
तैरता   रहता   हूँ   शून्य   में 
किसी   गहन   अँधेरे    में 

फिर    लौटना   नहीं   चाहता 
कोलाहल  में 
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(  काव्य  -- संग्रह   "  बची   हुई   हंसी   "  से   एक  कविता  )


सोमवार, 5 सितंबर 2016

उदास दिनों में

कविता 
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उदास  दिनों  में 
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अपने  सबसे  उदास   दिनों   में  भी 
इतना   उदास  नहीं  था   मैं  

तब   उदास  होने   के  लिए 
कुछ  भी  जरूरी  नहीं  था 

पेड़ों   से   झर   रहे   हो   पत्ते   तो 
उदास   हो  जाया  करता   था   
मेघों   से   टपक   रही   हों   बूंदें 
तो  उदास   हो  जाया  करता  था 

मेरे   सबसे   उदास   दिनों  में 
इतने   बुरे   नहीं  थे   लोग 
अपने   सबसे   बुरे  दिनों   में 
सबसे   अच्छे   मित्रों   के   साथ   रहा   मैं 

पृथ्वी   के  सबसे   उदास   दिनों  में   भी 
सबसे    अच्छे   मित्रों   के  साथ 
रहना   चाहता   हूँ  मैं 
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(  काव्य  -  संग्रह   "  उदाहरण   के  लिए   आदमी  "  से  )

सोमवार, 22 अगस्त 2016

बातें

कविता :  बातें 
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कभी  हमारे  पास 
इतनी  बातें    थीं  कि -
ख़त्म   ही  नहीं  होती  
प्रहरों   बातें  करते  हुए  
चौराहे  पर   खड़े  रहते 
अपने  अपने  घर  पहुँचने के 
बाद    याद    आता  कि  -
वो  बात  तो  कही ही  नहीं 
जो  बात  करने  घर  से  निकले  थे 
अब  मिलते  हैं  तो  करने  के  लिए 
कोई  बात  नहीं  होती  
करने  के  लिए  वो  बात  करते  हैं 
जो  बात  ही  नहीं  होती 
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शनिवार, 6 अगस्त 2016

उम्मीद

कविता 
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उम्मीद
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पहले  मुझे  उसकी  कभी 
प्रतीक्षा  नहीं  करनी  पड़ी 
क्योकि  वह   वहां 
पहले  से मौजूद  रहता  था 
जहाँ   मुझे  
उसकी   अपेक्षा   होती 

मुझे  अब भी उसकी 
प्रतीक्षा  नहीं  करनी  पड़ती 
क्योकि  वह  वहां  नहीं  आएगा 
जहाँ   मुझे  उसकी  अपेक्षा  तो  है 
पर  उम्मीद  नहीं   है 
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गुरुवार, 4 अगस्त 2016

अपने शहर में

कविता 
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अपने शहर में 
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सदी के मध्य में 
पृथ्वी पर  आया 
पचास वर्ष लग गए 
परिवेश को समझने में 

भूगोल अभी समझ 
नहीं आया 
नदियां समुद्र पहाड़ 
रेगिस्तान भी देखा 
खो गया घने जंगलों में 

चकित हुआ सूर्य और 
चन्द्रमा देख कर 
वर्षों निहारता रहा आकाश 

पहचान नहीं पाया 
अपने ही शहर के रास्ते 

रोज़ पूछता हूँ घर का रास्ता 
पूछ कर भटक जाता हूँ 
अपने ही शहर में 
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शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

लेकिन मैं नहीं होता

कविता 
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लेकिन   मैं   नहीं  होता 
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मैं   नहीं  लिखता   कविता  
तो  शायद   गायक   होता 
गाता   दादरा   ठुमरी   या   ग़ज़ल 

इतना    ही   असफल   होता 
जितना   कि   हूँ   कविता  में 

हो   सकता    है 
एक   असफल   चित्रकार   होता 

लेकिन   मैं   नहीं   होता 
एक   राजनीतिज्ञ 
प्रशासक   या   न्यायाधीश 

यद्पि    वहां    भी 
उतना    ही    असफल   होता 
जितना   कि     हूँ   कविता  में 

मुझे    असफल   भी   
कविता   में   ही    होना   था 

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रविवार, 10 जुलाई 2016

जयपुर छोड़ कर

 कविता 
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जयपुर  छोड़  कर 
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जब  नहीं   बचा 
इलाहाबाद   में  इलाहाबाद  
लखनऊ     में   लखनऊ 
भोपाल       में   भोपाल 
पटना         में    पटना 
दिल्ली        में    दिल्ली 

तो    क्यों    जाऊं   मैं 
जयपुर   छोड़    कर  
किसी   और   शहर  में 

क्या    सिर्फ   यही   कहने 
अब    जयपुर   में   भी 
नहीं      बचा     जयपुर 
(  मेरे   काव्य  -  संग्रह   "  बची   हुई   हंसी  "  में   संकलित )

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

सफल व्यक्ति

कविता 
सफल   व्यक्ति  वही  है 
जो  सब   कुछ  देखता  है  
आँखें   मूँद  कर 
और   तेजी  से  गुजर  जाता  है 
सब  कुछ  रौंदते   हुए  
जैसे   की  बुलडोजर 
गुजर   जाता   है  झोंपड़ियों   पर  से 
शायद   ये   जरूरत   भी   है 
एक   विकासशील    देश   की 

(   मेरी   एक    कविता   का   अंश  )

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

यात्रा

कविता
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 मैं न भी जानता तो क्या होता
जानता  भी  हूँ  तो  क्या  हुआ 
मुझे  इस  यात्रा  में शामिल  होना था 
और  मैं  हो  गया 
ये  सब  ऐसे  ही हुआ 
जैसे  मेरा  जन्म  हो गया 
ये  बात  और  है  कि 
मैं  किसी  से  साथ हीं  चल  सका 
इसलिए  नहीं  की  सभी  लोग 
बेईमान  या  भ्र्ष्ट  है या कि 
लोगों  ने  ही  मुझे  छोड़  दिया 
कारण  चाहे  कुछ भी  रहा हो 
इस  लम्बी  यात्रा  में मुझे 
अकेला  ही  होना  था 
कुछ बहुत  दूर  तक साथ चल कर 
मुड़  गए  सुख - सुविधा  की  गली में 
मैं  पांव  के  कांटे  निकाल  कर  
अकेला  ही  चलता  रहा जा  रहा हूँ
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मंगलवार, 28 जून 2016

समझ

कविता 
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समझ 
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जब  तक   वे  एक - दूसरे  को 
नहीं समझते   थे 
तब    तक      वे 
समझ   ने   की   कोशिश  में 
एक - दूसरे  के  
नजदीक   आते   चले   गए 

जब  वे  एक -  दूसरे  समझ  गए 
तब  समझ  जाने  के   कारण 
एक  -  दूसरे   से 
दूर   होते   चले   गए 

दूर   ही  नहीं   होते   चले   गए 
एक - दूसरे   को 
समझ   लेने   की 
धमकी   भी    देते     चले   गए 
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शनिवार, 25 जून 2016

जोखिम

कविता 
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जोखिम
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थोड़े से साहस  और 
हिम्मत  की  जरूरत  होती है 
कोई   जोखिम  लेने के लिए 

झूठ  बोलने 
चोरी  करने
रिश्वत  लेने 
धोखा  देने  के लिए 
साहस  की  जरूरत  होती है 

जिन  लोगों  ने 
दिखाया  साहस 
वे सफल  हुए 
जो थोड़े  बहुत  पकड़े  गए 
छूट  गए  कानून  को अंगूठा  दिखाते  हुए 

उन  दिनों   जब शहर में 
कई  हाउसिंग  सोसाइटियां 
उग  आई  थीं  कुकुरमुत्ते  की तरह 
लोग  सस्ते   में   खरीद  रहे  थे  ज़मीन 
जो   मकान  बनाने  के  लिए  स्वीकृत  नहीं थी 
खूब  कमाया  हाउसिंग  सोसाइटियों   ने 

साहसी   लोगों  ने 
बना  लिए  मकान  
बसती   गई   अनाधिकृत  कॉलोनियां 
अनियमित  एवं  अनियोजित  
राजनीतिज्ञों  ने  किया  समर्थन 
सरकार  ने कर  दिया  नियमन 
वोट  लेने  के  लिए 

वे   सभी  जोखिम  
लेने  वाले  साहसी  व्यक्ति  
जिन्होंने  चंद   हजार  में 
खरीदी   थी   जमीन 
लाखों  की  संपत्ति  के  मालिक  हो  गए 

मुझ  जैसे  डरपोक 
जोखिम  न  लेने  वाले 
किसी  क्षेत्र  में भी 
सफल  नहीं   हो  सकते 
 न  ही   सम्पन्न 
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(  "  उदभावना  "  मार्च - जून '    2016 में  प्रकाशित  )

मंगलवार, 14 जून 2016

हम ख्याल

कविता
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हम  खयाल
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मैं जो सोच रहा होता
वही वह कह रहा होता
कभी कभी तो एक ही बात
एक साथ कह पड़ते हम
एक से थे हमारे खयालात
तब हमारी कोई महत्वाकांक्षा नहीं थी

जहां मुझे जाना होता
वहीं वह जा रहा होता
अलग अलग राह होने पर भी
एक ही स्थान पर
एक साथ पहुँच जाते हम
तब हमारी कोई पहचान नहीं थी

जब पहचान का संकट हुआ
एक राह होने पर भी
एक ही स्थान पर
अलग अलग पहुँते हुये
एक ही विषय पर 
विरोधी स्वर में बोलते हैं हम

अहंकार ने इतनी 
दूरियां बढ़ा दी
जो कभी हमराज थे
एक दूसरे का  
राज खोलते हैं हम
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( " उद् भावना  " मार्च - जून' 2016 में  प्रकाशित )


मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

एक तारा

कविता 
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 ( एक )
एक तारा
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मैं जानता  हूँ 
मैं सूरज नहीं हूँ 
चाँद भी नहीं हूँ 

सूरज तो  मैं 
होना भी नहीं चाहता था 
चाँद  की तरह 
घटते  - बढ़ते  रहना   चाहता था 
अँधेरे में चमकते रहना चाहता था 
शीतलता में 
मुस्कराते रहना चाहता था 

लेकिन मैं चाँद 
नहीं हो सका 
एक तारा हो कर  रह गया 
 किसी की आँख का तारा नहीं 
एक टिमटिमाता  तारा 
अरबों - खरबों तारों के बीच 
एक तारा 
जिसकी कोई पहचान नहीं 
जिसकी कोई रोशनी नहीं 
एक रात टूट जाऊंगा 
टूट कर बिखर जाऊंगा 
आकाश में 
आस पास के तारे 
आह भर कर रह जायेगें 

पेड़ पर बैठे पंछी 
चाँद को देखते हुए कहेगें 
टूट गया एक और तारा 
जिसका कोई नाम नहीं था
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( दो )
आकस्मिक 
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 कुछ भी हो सकता है 
आकस्मिक 
अपेक्षा रखते है 
जिसके होने की 
वह नहीं होता 

योजना बना कर 
 जो करते है 
वह भी अक्सर नहीं होता 

कुछ घटनाएं होती हैं 
हम मान कर चलते हैं 
समय पर नहीं होती 
किन्तु आकस्मिक भी नहीं होती 

कुछ घटनाओं  का होना 
निश्चित नहीं होता 
वे होती हैं आकस्मिक 
जैसे प्रेम 

कुछ घटनाओं का
अपेक्षित   नहीं  होता 
वे भी होती हैं आकस्मिक 
जैसे विश्वासघात 
जैसे हृदयाघात 

निश्चित होता है 
जिसका होना 
 वह भी होती है 
आकस्मिक 
जैसे मृत्यु। 
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( "  नया ज्ञानोदय " भारतीय ज्ञानपीठ , नई दिल्ली )
(  माह  अप्रैल ' २०१६  के अंक में  प्रकाशित )

बुधवार, 30 दिसंबर 2015

बिखरा हुआ जीवन

कविता 
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बिखरा हुआ जीवन
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एक दिन मुझे 
ख्याल आया 
अब सिमेट लेना चाहिए 

इधर -उधर देखा 
कुछ  भी नहीं था 
सिमेट लेने के लिए 
कुछ पत्र - पत्रिकाओं 
और पुस्तकों के अतिरिक्त 
जो बिखरी हुई थीं मेरे बाहर 

मैं तो सिमटा हुआ ही रहा 
कभी फैलाया नहीं स्वयं को 
अपने से बाहर 

सिमटते -सिमटते 
इतना सिकुड़ गया कि -
सिलवटें पड़ गईं 

जीवन में कभी 
दौड़ नहीं लगाई 
धीमें धीमें ही चलता  रहा 

सिमटा - सिकुड़ा 
कछुए  से सा जीवन जिया मैंने 

फिर न जाने क्यों 
मुझे ख्याल आया 
अब सिमेट लेना चाहिए 

एक बार और 
इधर- उधर देखा 
देखा अपने अंदर 
सिमटते - सिमटते भी 
कितना बिखर गया था 

इतना बिखरा था जीवन 
सिमेटा नहीं जा सकता था. 
       -------------
( राजस्थान पत्रिका, जयपुर। रविवार' २७दिस्म्बर' २०१५ में पकाशित )


पुराना साज़

तीन कवितायेँ                     
--------------                [ एक ]
पुराना  साज़  
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जब कभी उदास होता 
लेकर  बैठ जाता  पुराना साज़ 
जिसे छेडने  पर निकलती मधुर धुनें 

दर्द भरे गीतों में ही नहीं 
उल्लास और प्रेम गीतों  में भी 
कितनी  ख़ामोशी थी 
दुःख हों या खुशियां 
छलक पड़ते थे आंसू
अंदर का कोलाहल 
साज़ ही महसूस करता  था 

हैं  सबसे मधुर वो गीत 
जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं 

एक दिन टूट गया वो साज़ 
जैसे टूट जाता है कोई सम्बन्ध 
एक पचास वर्ष पुराने साज़ के 
टूट जाने का अंदेशा तो रहता है 
एक पचास वर्ष पुराने सम्बन्ध का 
अनायास तो नहीं होता टूट जाना 
अंदेशा न रहता हो तो  भी 

मेरे टूटे हुए  दिल से 
कोई तो आज ये पूछे

अब भी कभी कभी 
टूटे हुए साज़ को ले कर बैठ जाता हूँ 
छेड़ने पर जिसमें से निकलती है 
टूटी भर्राई  सी आवाज 

मुझको  इस रात की तन्हाई में 
आवाज न दो

नए साज़ में कितनी ही पुरानी धुनें 
निकाल ने की कोशिश करो
वो सुर नहीं मिलता 
जैसे नए सम्बन्धों में 
कितनी ही गर्माहट हो 
 वो ऊष्मा नहीं मिलती 

सुर न सधे क्या गाउँ  मैं 
सुर के बिना जीवन सूना 

ज़माना बदलता है तो 
साज़ भी बदल जाते हैं 
सरोकार बदल जाते हैं तो 
सम्बन्ध भी बदल जाते हैं 

यूँ ही दुनिया बदलती है 
इसी का नाम दुनिया है 
          ---------               [ दो ]

बातें
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कभी हमारे  पास 
इतनी बातें थी कि -
ख़त्म ही नहीं होती थीं 

प्रहरों बातें करते हुए 
चौराहे पर खड़े रहते 

अपने - अपने घर
पहुँचने के बाद 
याद आता कि -
वो बात तो कही ही नहीं 
जो बात करने घर से निकले थे 

अब मिलते हैं तो 
करने के लिए 
कोई बात नहीं होती 

करने के लिए 
वो बात करते हैं 
जो बात ही नहीं होती 
        -------                  [ तीन ] 
उम्मीद 
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पहले मुझे कभी 
उसकी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी 
क्योंकि वह वहां 
पहले से ही मौजूद रहता था 
जहाँ मुझे 
उसकी अपेक्षा होती 

मुझे अब भी 
उसकी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती 
क्योंकि वह 
वहां नहीं आएगा 
जहाँ मुझे 
उसकी अपेक्षा तो है 
पर उम्मीद नहीं
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[" वागर्थ " अंक २४५  दिसम्बर' २०१५ में प्रकाशित  ]