कविता
-----------
सोने की चिड़िया
------------------
दूध के धुले हुए तो हम
तब भी नहीं थे
दूध में पानी मिलाना तो
तब से ही शुरू कर दिया था
जब दूध की कमी नहीं थी
उन्ही दिनों आटे में नमक
कहावत को समाज में स्वीकृति मिल गई थी
देशी घी में डालडा घुल मिल चुका था
मिर्च में लाल रंग और
धनिये में घोड़े की लीद के
बारे में हम सुन चुके थे
लेकिन इस सब के बावजूद
एक उम्मीद बची थी कि
सब ठीक हो जायेगा
ये देश फिर से
सोने कि चिड़िया हो जायेगा
तब तक मिलावट करने वाला बनिया
तस्करी करने वाला व्यापारी
जिस्म का सौदा करने वाला दलाल
भेदभाव फ़ैलाने वाला धर्म गुरु
हथियारों का सोदा करने वाला तांत्रिक
राजनेता से उजाले में नहीं मिलता था
समाचार पत्रों में
चित्र साथ साथ नहीं छपते थे
उमीद थी कि कुछ बेईमान लोग
जल्दी ही बेनकाब कर दिए जायेगे
युवा तुर्क संसद में दहाड़ रहे थे
गरीबी हटाओ और समाजवाद लाओ के
नारो की गूँज से पूंजीवाद देश में
इस तरह कांप रहा था
जैसे एक सर्वहारा ठण्ड की रातों में
आज भी कांप रहा है
उम्मीद रंग लायी और खूब लायी
चंद शब्द , शब्द कोश से बाहर कर दिए गए
चंद लोग पागल करार कर दिए गए
बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बुलाया गया
देश में खुलापन लाया गया
सब कुछ ठीक हो गया
देश फिर से सोने की चिडिया हो गया
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शुक्रवार, 19 मार्च 2010
शनिवार, 27 फ़रवरी 2010
कविता
------------
अक्सर हम भूल जाते है
-----------------------------
अक्सर हम भूल जाते हैं चाबियाँ
जो किसी खजाने की नहीं होती
अक्सर रह जाता है हमारा कलम
किसी अनजान के पास
जिससे वह नहीं लिखेगा कविता
अक्सर हम भूल जाते हैं
उन मित्रों के टेलीफ़ोन नंबर
जिनसे हम रोज मिलते है
डायरी में मिलते है
उन के टेलीफोन नंबर
जिन्हें हम कभी फ़ोन नहीं करते
अक्सर हम भूल जाते हैं
रिश्तेदारों के बदले हुए पते
याद रहती है रिश्तेदारी
अक्सर याद नहीं रहते
पुरानी अभिनेत्रियों के नाम
याद रहते है उनके चेहरे
अक्सर हम भूल जाते हैं
पत्नियों द्वारा बताये काम
याद रहती है बच्चों की फरमाइश
हम किसी दिन नहीं भूलते
सुबह दफ्तर जाना
शाम को बुद्धुओं की तरह
घर लौट आना
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------------
अक्सर हम भूल जाते है
-----------------------------
अक्सर हम भूल जाते हैं चाबियाँ
जो किसी खजाने की नहीं होती
अक्सर रह जाता है हमारा कलम
किसी अनजान के पास
जिससे वह नहीं लिखेगा कविता
अक्सर हम भूल जाते हैं
उन मित्रों के टेलीफ़ोन नंबर
जिनसे हम रोज मिलते है
डायरी में मिलते है
उन के टेलीफोन नंबर
जिन्हें हम कभी फ़ोन नहीं करते
अक्सर हम भूल जाते हैं
रिश्तेदारों के बदले हुए पते
याद रहती है रिश्तेदारी
अक्सर याद नहीं रहते
पुरानी अभिनेत्रियों के नाम
याद रहते है उनके चेहरे
अक्सर हम भूल जाते हैं
पत्नियों द्वारा बताये काम
याद रहती है बच्चों की फरमाइश
हम किसी दिन नहीं भूलते
सुबह दफ्तर जाना
शाम को बुद्धुओं की तरह
घर लौट आना
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सोमवार, 8 फ़रवरी 2010
कविता
-----------
बाथ रूम
------------
उन्होने बनवाया एक आलीशान मकान
लाखों में खरीदी थी जमीन
करोड़ों में कमाया था काला धन
राजधानी से आया वास्तुकार
दूर दराज से आये पत्थर
गलियारे में लगा था सफ़ेद संगमरमर
मकान में सबसे शानदार
और देखने लायक था
उनका बाथ रूम
जगमगाता उजला
चांदनी से नहाया फर्श
जिस पर ठिठक जाएँ पैर
कहते है काला धन
खपाया जाता है मकान बनवाने में
या विवाह समारोह के शामियाने में
वे हर बड़े आदमी की तरह
अक्सर रहते थे बाथरूम में
एक दिन समाचार मिला
एक दम चित गिरे थे
फिर नहीं उठ पाए बाथ रूम से
बचपन में कहानियों में पढ़ा था
अक्सर जादूगर की जान किसी
पुराने किले में बंद
तोते में हुआ करती थी
कहते है उनकी जान बाथ रूम में थी.
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बाथ रूम
------------
उन्होने बनवाया एक आलीशान मकान
लाखों में खरीदी थी जमीन
करोड़ों में कमाया था काला धन
राजधानी से आया वास्तुकार
दूर दराज से आये पत्थर
गलियारे में लगा था सफ़ेद संगमरमर
मकान में सबसे शानदार
और देखने लायक था
उनका बाथ रूम
जगमगाता उजला
चांदनी से नहाया फर्श
जिस पर ठिठक जाएँ पैर
कहते है काला धन
खपाया जाता है मकान बनवाने में
या विवाह समारोह के शामियाने में
वे हर बड़े आदमी की तरह
अक्सर रहते थे बाथरूम में
एक दिन समाचार मिला
एक दम चित गिरे थे
फिर नहीं उठ पाए बाथ रूम से
बचपन में कहानियों में पढ़ा था
अक्सर जादूगर की जान किसी
पुराने किले में बंद
तोते में हुआ करती थी
कहते है उनकी जान बाथ रूम में थी.
मंगलवार, 12 जनवरी 2010
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कविता
-----------
नीली धारिओं वाला स्वेटर
------------------------------
कैसी भी रही हो ठण्ड
ठिठुरा देने वाली या गुलाबी
एक ही स्वेटर था मेरे पास
नीली धारिओं वाला
बहिन के स्वेटर बुनने से पहले
किसी की उतरी हुई जाकेट
पहन ता था मैं
जाकेट में गर्माहट थी
पर जाकेट पहन कर
ख़ुशी नहीं मिलती थी मुझे
एक उदासी छा जाती थी
मेरे चेहरे पर
बहिन मेरे चेहरे पर छाई
उदासी पढ़ कर
खुद भी उदास हो जाया करती थी
बहिन ने थोड़े थोड़े पैसे बचा कर
ख़रीदे सफ़ेद नीले ऊन के गोले
एक सहेली से मांग लाई सलाई
किसी पत्रिका के बुनाई विशेषांक से
सीखी बुनाई
दो उल्टे एक सीधा
एक उल्टा दो सीधे डाले फंदे
कई दिनों तक नापती रही
मेरा गला और लम्बाई
गिनती रही फंदे
बदलती रही सलाई
ठिठुराती ठण्ड आने से पहले
एक दिन बहिन ने
पहना दिया मुझे नया स्वेटर
बहिन की ऊंगलियों की ऊष्मा
समां गई थी स्वेटर में
मेरे चेहरे पर आई चमक
देख कर खुश थी बहिन
मेरा स्वेटर देख कर
लड़कियां पूछती थी
कलात्मक बुनाई के बारे में
बहिन के ससुराल जाने बाद भी
कई वर्षों तक पहनता रहा मैं
नीली धारिओं वाला स्वेटर
उस स्वेटर जैसी ऊष्मा
फिर किसी स्वेटर में नहीं मिली
उस स्वेटर की स्मृति में
आज भी ठण्ड नहीं लगती मुझे
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कविता
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नीली धारिओं वाला स्वेटर
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कैसी भी रही हो ठण्ड
ठिठुरा देने वाली या गुलाबी
एक ही स्वेटर था मेरे पास
नीली धारिओं वाला
बहिन के स्वेटर बुनने से पहले
किसी की उतरी हुई जाकेट
पहन ता था मैं
जाकेट में गर्माहट थी
पर जाकेट पहन कर
ख़ुशी नहीं मिलती थी मुझे
एक उदासी छा जाती थी
मेरे चेहरे पर
बहिन मेरे चेहरे पर छाई
उदासी पढ़ कर
खुद भी उदास हो जाया करती थी
बहिन ने थोड़े थोड़े पैसे बचा कर
ख़रीदे सफ़ेद नीले ऊन के गोले
एक सहेली से मांग लाई सलाई
किसी पत्रिका के बुनाई विशेषांक से
सीखी बुनाई
दो उल्टे एक सीधा
एक उल्टा दो सीधे डाले फंदे
कई दिनों तक नापती रही
मेरा गला और लम्बाई
गिनती रही फंदे
बदलती रही सलाई
ठिठुराती ठण्ड आने से पहले
एक दिन बहिन ने
पहना दिया मुझे नया स्वेटर
बहिन की ऊंगलियों की ऊष्मा
समां गई थी स्वेटर में
मेरे चेहरे पर आई चमक
देख कर खुश थी बहिन
मेरा स्वेटर देख कर
लड़कियां पूछती थी
कलात्मक बुनाई के बारे में
बहिन के ससुराल जाने बाद भी
कई वर्षों तक पहनता रहा मैं
नीली धारिओं वाला स्वेटर
उस स्वेटर जैसी ऊष्मा
फिर किसी स्वेटर में नहीं मिली
उस स्वेटर की स्मृति में
आज भी ठण्ड नहीं लगती मुझे
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शनिवार, 26 दिसंबर 2009
कविता
----------
अच्छा कवि
--------------
मैंने कहा वे एक बहुत अच्छे आदमी है
बहुत मिलनसार जिंदादिल
गर्व उनको छू भी नहीं गया है
अपनों से छोटों से भी खुलापन रखते है
समय पर सुख दुःख में भी काम आते है
उसने कहा हाँ होंगे
क्या अच्छा आदमी होने से
कोई अच्छा कवि भी हो जाता है
बहुत घटिया कवितायेँ लिखते है वे
हम उन्हें कवि नहीं मानते
मैंने कहा वे एक बहुत अच्छे कवि है
अध्यन भी खूब है उनका
कभी हिंदी कविता की बात ही नहीं करते
सभी पत्रिकाएं छापती है उनकी कवितायेँ
कई पुरस्कार भी मिल चुके है उन्हें
उसने कहा
पुरस्कार मिलने से कोई बड़ा कवि नहीं हो जाता
विदेशी साहित्य की चोरी करते है
अच्छा कवि होने के लिए
अच्छा आदमी भी होना चाहिए
बहुत घटिया आदमी है वे
हम उन्हें कवि नहीं मानते
मैंने कहा वे एक बहुत प्रतिष्ठित कवि है
मानवीय गुन भी कूट कूट कर भरे है उनमे
अपनी माटी की महक है उनकी कविताओं में
लखटकिया पुरस्कार भी मिल चुका है
नामवर आलोचक भी प्रशंसा करते है उनकी
उसने कहा
सब जोड़ तोड़ और सम्बन्धों के सहारे किया है
बड़े शातिर और हिसाबी आदमी है वे
पूरा एक गुट है उनका
जो एक दूसरे की प्रशंसा करता रहता है
हम उन्हें कवि नहीं मानते
वे हमारे गुट में नहीं है
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अच्छा कवि
--------------
मैंने कहा वे एक बहुत अच्छे आदमी है
बहुत मिलनसार जिंदादिल
गर्व उनको छू भी नहीं गया है
अपनों से छोटों से भी खुलापन रखते है
समय पर सुख दुःख में भी काम आते है
उसने कहा हाँ होंगे
क्या अच्छा आदमी होने से
कोई अच्छा कवि भी हो जाता है
बहुत घटिया कवितायेँ लिखते है वे
हम उन्हें कवि नहीं मानते
मैंने कहा वे एक बहुत अच्छे कवि है
अध्यन भी खूब है उनका
कभी हिंदी कविता की बात ही नहीं करते
सभी पत्रिकाएं छापती है उनकी कवितायेँ
कई पुरस्कार भी मिल चुके है उन्हें
उसने कहा
पुरस्कार मिलने से कोई बड़ा कवि नहीं हो जाता
विदेशी साहित्य की चोरी करते है
अच्छा कवि होने के लिए
अच्छा आदमी भी होना चाहिए
बहुत घटिया आदमी है वे
हम उन्हें कवि नहीं मानते
मैंने कहा वे एक बहुत प्रतिष्ठित कवि है
मानवीय गुन भी कूट कूट कर भरे है उनमे
अपनी माटी की महक है उनकी कविताओं में
लखटकिया पुरस्कार भी मिल चुका है
नामवर आलोचक भी प्रशंसा करते है उनकी
उसने कहा
सब जोड़ तोड़ और सम्बन्धों के सहारे किया है
बड़े शातिर और हिसाबी आदमी है वे
पूरा एक गुट है उनका
जो एक दूसरे की प्रशंसा करता रहता है
हम उन्हें कवि नहीं मानते
वे हमारे गुट में नहीं है
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सोमवार, 14 दिसंबर 2009
कविता
-------------
वह आदमी कुछ नहीं बोलता
-------------------------------
वह आदमी कुछ नहीं बोलता
रहता है एक दम चुप
सुनता है सब की
वह पैदा हुआ है केवल सुनने के लिए
सारे आदर्श ढोने है उसे
देश की अखंडता का भार है उस पर
नैतिकता ढूंढी जाती है उसमे
ईमानदार होना है केवल उसे
अशिक्षित और निरीह
बने रहना है उसे
ताकि देश के कर्णधार
राजनीतिज्ञ ,पूंजीपति और विद्वान
दिखा सके उसे राह
वह पैदा हुआ है केवल राह देखने के लिए
धर्म और जातिवाद से ऊपर
उठ कर जीना है उसे
सामाजिक कुरूतियों से लड़ना है
गर्व करना है अपनी भाषा पर
देश की अस्मिता और संस्कृति को
बचाना है केवल उसे
क्योंकि वह एक महान देश का
आम नागरिक है.
-------------------------------------
सोमवार, 7 दिसंबर 2009
कविता
--------
बचा हुआ स्वाद
-------------------
जीभ का भूला हुआ स्वाद
जीभ पर नहीं है
सुरक्षित है मेरी स्मृति में
न रोटियों में
न दाल में
न अचार में
बचा है स्वाद
मेरी स्मृतियों में
बचाए रखना चाहता हूँ
थोड़ी सी महक
थोड़ी सी गंध
थोड़ी सी भूख
थोड़ी सी प्यास
अपनी स्मृतियों में
बचाए रखना चाहता हूँ
खाली पेट देखे स्वप्न
खट्टे मीठे फालसों
काली जामुन और
लाल बेर का रंग
मुंह में आया पानी
और बचा हुआ स्वाद
अपनी स्मृतियों में.
----------------------
--------
बचा हुआ स्वाद
-------------------
जीभ का भूला हुआ स्वाद
जीभ पर नहीं है
सुरक्षित है मेरी स्मृति में
न रोटियों में
न दाल में
न अचार में
बचा है स्वाद
मेरी स्मृतियों में
बचाए रखना चाहता हूँ
थोड़ी सी महक
थोड़ी सी गंध
थोड़ी सी भूख
थोड़ी सी प्यास
अपनी स्मृतियों में
बचाए रखना चाहता हूँ
खाली पेट देखे स्वप्न
खट्टे मीठे फालसों
काली जामुन और
लाल बेर का रंग
मुंह में आया पानी
और बचा हुआ स्वाद
अपनी स्मृतियों में.
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शनिवार, 21 नवंबर 2009
कविता
------
पिता
-------
सर्दियों की ठिठुरती सुबह में
मेरा पुराना कोट पहने
सिकुड़े हुए कही दूर से
दूध लेकर आते है पिता
दरवाजे पर उकडू से बैठे
बीडी पीते हुए
मुझे आता देख
हड़बड़ी में
खड़े हो जाते है पिता
सारा दिन निरीहता से
चारों तरफ देखते
चारपाई बैठे खांसते
मुझे देख कर चौंक उठते है पिता
मैं कभी भी
उनके पैर नहीं छूता
कभी हाल नहीं पूछता
जीता हूँ एक दूरी
महसूसता हूँ
उनका होना
सोचता हूँ
यह कब से हुआ पिता
-------------------------
------
पिता
-------
सर्दियों की ठिठुरती सुबह में
मेरा पुराना कोट पहने
सिकुड़े हुए कही दूर से
दूध लेकर आते है पिता
दरवाजे पर उकडू से बैठे
बीडी पीते हुए
मुझे आता देख
हड़बड़ी में
खड़े हो जाते है पिता
सारा दिन निरीहता से
चारों तरफ देखते
चारपाई बैठे खांसते
मुझे देख कर चौंक उठते है पिता
मैं कभी भी
उनके पैर नहीं छूता
कभी हाल नहीं पूछता
जीता हूँ एक दूरी
महसूसता हूँ
उनका होना
सोचता हूँ
यह कब से हुआ पिता
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गुरुवार, 12 नवंबर 2009
कविता
-----------
सत्य का चेहरा
------------------
सत्य का एक चेहरा होता है
रंगहीन भी नहीं होता सत्य
लेकिन झूठ कि तरह
हर कहीं नहीं होता सत्य
न ही झूठ में घुल पाता है
अगर होता है कहीं तो
अलग से दिव्या आलोक लिए
दमकता रहता है सत्य
इधर वर्षों से कहीं गुम हो गया है सत्य
हम में से कई लोगो ने
अपने जीवन में कभी देखा ही नहीं
कैसा होता है सत्य
कुछ लोग निरंतर
जब की कुछ लोग
दावा कर रहे है कि
उन्होने खोज लिया है है सत्य
जिसे वे सत्य समझ रहे है
हज़ार बार बोला गया झूठ है
रगड़ रगड़ कर पैदा कि गई चमक है
वे आनंदित प्रमुदित है
अपनी खोज पर
उन्होने पा लिया है सत्य
हे ईश्वर
उन्हें बता कि सत्य क्या है
---------------------------
-----------
सत्य का चेहरा
------------------
सत्य का एक चेहरा होता है
रंगहीन भी नहीं होता सत्य
लेकिन झूठ कि तरह
हर कहीं नहीं होता सत्य
न ही झूठ में घुल पाता है
अगर होता है कहीं तो
अलग से दिव्या आलोक लिए
दमकता रहता है सत्य
इधर वर्षों से कहीं गुम हो गया है सत्य
हम में से कई लोगो ने
अपने जीवन में कभी देखा ही नहीं
कैसा होता है सत्य
कुछ लोग निरंतर
सत्य की खोज में
भटक रहे है आजभी
जब की कुछ लोग
दावा कर रहे है कि
उन्होने खोज लिया है है सत्य
जिसे वे सत्य समझ रहे है
हज़ार बार बोला गया झूठ है
रगड़ रगड़ कर पैदा कि गई चमक है
वे आनंदित प्रमुदित है
अपनी खोज पर
उन्होने पा लिया है सत्य
हे ईश्वर
उन्हें बता कि सत्य क्या है
---------------------------
बुधवार, 4 नवंबर 2009
कविता
---------
कविता से कोई नहीं डरता
--------------------------------
किसी काम के नहीं होते कवि
बिजली का उड़ जाये फ्यूज तो
फ्यूज बांधना नहीं आता
नल टपकता हो तो
टपकता रहे रात भर
चाहे कितने ही कला प्रेमी हों
एक तस्वीर तरीके से नहीं
लगा सकते कमरे में
कुछ नहीं समझते कवि
पेड़ पौधों और फूलों के
विषय में खूब बात करते है
छाँट नहीं सकते
अच्छी तुरई और टिंडे
जब देखो उठा लाते है
गले हुए केले और आम
वे नमक पर लिखते है कविता
दाल में कम हो नमक तो
उन्हें महसूस नहीं होता
रोटी पर लिखते है कविता
रोटी कमाना नहीं आता
वे प्रेम पर लिखते है कविता
प्रेम जताना नहीं आता
कवियों का हो जाये ट्रांसफर
तो घूमते रहते है सचिवालय में
जब तब सुरक्षा कर्मचारी
बाहर कर देता है
प्रशासनिक अधिकारी
मिलने का समय नहीं देते
कौन पूछता है कवियों को
अच्छे पद पर हो तो बात और है
कविता से कोई नहीं डरता
कविता लिखते है
अपने आसपास के परिवेश पर
प्रकाशित होते है सुदूर पत्रिकाओं में
अपने शहर में भी
उन्हें कोई नहीं जानता
अपने घर में भी उन्हें
कोई नहीं मानता
कवियों को तो होना चाहिए
संत-फ़कीर
कवियों को होना चाहिए
निराला-कबीर
----------------------------
---------
कविता से कोई नहीं डरता
--------------------------------
किसी काम के नहीं होते कवि
बिजली का उड़ जाये फ्यूज तो
फ्यूज बांधना नहीं आता
नल टपकता हो तो
टपकता रहे रात भर
चाहे कितने ही कला प्रेमी हों
एक तस्वीर तरीके से नहीं
लगा सकते कमरे में
कुछ नहीं समझते कवि
पेड़ पौधों और फूलों के
विषय में खूब बात करते है
छाँट नहीं सकते
अच्छी तुरई और टिंडे
जब देखो उठा लाते है
गले हुए केले और आम
वे नमक पर लिखते है कविता
दाल में कम हो नमक तो
उन्हें महसूस नहीं होता
रोटी पर लिखते है कविता
रोटी कमाना नहीं आता
वे प्रेम पर लिखते है कविता
प्रेम जताना नहीं आता
कवियों का हो जाये ट्रांसफर
तो घूमते रहते है सचिवालय में
जब तब सुरक्षा कर्मचारी
बाहर कर देता है
प्रशासनिक अधिकारी
मिलने का समय नहीं देते
कौन पूछता है कवियों को
अच्छे पद पर हो तो बात और है
कविता से कोई नहीं डरता
कविता लिखते है
अपने आसपास के परिवेश पर
प्रकाशित होते है सुदूर पत्रिकाओं में
अपने शहर में भी
उन्हें कोई नहीं जानता
अपने घर में भी उन्हें
कोई नहीं मानता
कवियों को तो होना चाहिए
संत-फ़कीर
कवियों को होना चाहिए
निराला-कबीर
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सोमवार, 26 अक्टूबर 2009
कविता
---------
दूसरे शहर में
------------------
दूसरे शहर में घर नहीं होता
समाचार पत्र में नहीं मिलते
अपने शहर के समाचार
दूसरे शहर में
सड़क पर चलते हुए
ये अहसास साथ चलता
यहाँ इस शहर में
मुझे कोई नहीं पहचानता
घर से दूर
अधिक याद आता है घर
बार बार याद आते है बच्चे
लौट आयें होगें स्कूल से
खेल रहे होंगें शायद
पूछ रहे होंगे मम्मी से
कल सुबह तो आ ही जायेगें पापा
दूसरे शहर में ठण्ड
अधिक लगती है
थक जाता हूँ बहुत जल्दी
दूसरे शहर में
मुझे नींद नहीं आती
रहता है पेट ख़राब
खाना कम खाता हूँ
सिगरेट ज्यादा पीता हूँ
दूसरे शहर की इमारते
लगती है अजायबघर
लड़कियां लगती है खूबसूरत
दूसरा शहर लगता है
दूसरे देश में
दूसरे शहर से
अपना शहर लगता है
बहुत दूर
दूसरे शहर से
लौट कर अच्छा लगता है
नक्शे में ढूँढना
दूसरा शहर
---------------------------------
शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009
कविता
-------------
तस्वीरों से झांकते पुराने मित्र
------------------------------------
श्वेत श्याम तस्वीरों में
अभी मौजूद है पुराने मित्र
गले में बांहे डाले या
कंधे पर कुहनी टिकाये
तस्वीरें देख कर नहीं लगता
बरसों से नहीं मिले होगें
ये मासूम से दिखने वाले
दुबले पतले छोकरे
तस्वीरों से बाहर
मिलना नहीं होता पुराने मित्रों से
कुछ एक को तो देखे हुए भी
पन्द्रह बीस साल गुजर गए
एक शहर में रहते हुए भी
कभी कभार कहीं से
खबर मिलती किसी की
आकाश की मुत्यु को दो साल होगये
विमल बहुत शराब पीने लगा है
श्याम बाबू दुबई में है इन दिनों
अचकचा गया एक दिन
अजमेरी गेट पर अंडे खरीदते हुए
एक मोटे आदमी को देख कर
प्रमोद हंस रहा था मुझे पहचान कर
महानगर होते शहर में
ऐसा कभी ही होता है
कोई आपको पहचान रहा हो
ये सोच कर उदास हो जाता है मन
जिन मित्रों के साथ जमती थी महफ़िल
मिलते थे हर रोज़
घंटों खड़े रहते थे चौराहे पर
वे बचपन के मित्र जीवन से निकल कर
तस्वीरों में रह गए है
-----------------------------------------
-------------
तस्वीरों से झांकते पुराने मित्र
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श्वेत श्याम तस्वीरों में
अभी मौजूद है पुराने मित्र
गले में बांहे डाले या
कंधे पर कुहनी टिकाये
तस्वीरें देख कर नहीं लगता
बरसों से नहीं मिले होगें
ये मासूम से दिखने वाले
दुबले पतले छोकरे
तस्वीरों से बाहर
मिलना नहीं होता पुराने मित्रों से
कुछ एक को तो देखे हुए भी
पन्द्रह बीस साल गुजर गए
एक शहर में रहते हुए भी
कभी कभार कहीं से
खबर मिलती किसी की
आकाश की मुत्यु को दो साल होगये
विमल बहुत शराब पीने लगा है
श्याम बाबू दुबई में है इन दिनों
अचकचा गया एक दिन
अजमेरी गेट पर अंडे खरीदते हुए
एक मोटे आदमी को देख कर
प्रमोद हंस रहा था मुझे पहचान कर
महानगर होते शहर में
ऐसा कभी ही होता है
कोई आपको पहचान रहा हो
ये सोच कर उदास हो जाता है मन
जिन मित्रों के साथ जमती थी महफ़िल
मिलते थे हर रोज़
घंटों खड़े रहते थे चौराहे पर
वे बचपन के मित्र जीवन से निकल कर
तस्वीरों में रह गए है
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शनिवार, 10 अक्टूबर 2009
कविता
-----------
नींद में स्त्री
----------------
कई हज़ार वर्षों से
नींद में जाग रही है वह स्त्री
नींद में भर रही है पानी
नींद में बना रही व्यंजन
नींद में बच्चों को
खिला रही है चावल
कई हज़ार वर्षों से
नींद में कर रही है प्रेम
पूरे परिवार के कपडे धोते हुए
जूठे बर्तन साफ़ करते हुए
थकती नहीं है वह स्त्री
हजारों मील नींद में चलते हुए
जब पूरा परिवार
सो जाता है संतुष्ट हो कर
तब अँधेरे में
अकेली बिल्कुल अकेली
नींद में जागती रहती है वह स्त्री
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नींद में स्त्री
----------------
कई हज़ार वर्षों से
नींद में जाग रही है वह स्त्री
नींद में भर रही है पानी
नींद में बना रही व्यंजन
नींद में बच्चों को
खिला रही है चावल
कई हज़ार वर्षों से
नींद में कर रही है प्रेम
पूरे परिवार के कपडे धोते हुए
जूठे बर्तन साफ़ करते हुए
थकती नहीं है वह स्त्री
हजारों मील नींद में चलते हुए
जब पूरा परिवार
सो जाता है संतुष्ट हो कर
तब अँधेरे में
अकेली बिल्कुल अकेली
नींद में जागती रहती है वह स्त्री
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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2009
कविता
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काम से लौटती स्त्रियाँ
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जिस तरह हवाओं में
लौटती है खुशबू
पेडों पर लौटती है चिडियां
शाम को घरों को
लौटती है काम पर गई स्त्रियाँ
सारा दिन बदन पर
निगाहों की चुभन महसूस करती
फूहड़ और अश्लील चुटकुलों से ऊबी
शाम को घरों को
लौटती है काम पर गई स्त्रियाँ
उदास बच्चों के लिया टाफियाँ
उदासीन पतियों के लिए
सिगरेट के पैकेट खरीदती
शाम को घरों को
लौटती है काम पर गई स्त्रियाँ
काम पर गई स्त्रियों के साथ
लौटता है घरेलूपन
चूल्हों में लौटती है आग
दीयों में लौटती है रोशनी
बच्चों लौटती है हंसी
पुरुषों में लौटता है पौरुष
आकाश अपनी जगह
दिखाई देता है
पृथ्वी घूमती है
अपनी धुरी पर
जब शाम को घरों को
लौटती है काम पर गई स्त्रियाँ
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काम से लौटती स्त्रियाँ
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जिस तरह हवाओं में
लौटती है खुशबू
पेडों पर लौटती है चिडियां
शाम को घरों को
लौटती है काम पर गई स्त्रियाँ
सारा दिन बदन पर
निगाहों की चुभन महसूस करती
फूहड़ और अश्लील चुटकुलों से ऊबी
शाम को घरों को
लौटती है काम पर गई स्त्रियाँ
उदास बच्चों के लिया टाफियाँ
उदासीन पतियों के लिए
सिगरेट के पैकेट खरीदती
शाम को घरों को
लौटती है काम पर गई स्त्रियाँ
काम पर गई स्त्रियों के साथ
लौटता है घरेलूपन
चूल्हों में लौटती है आग
दीयों में लौटती है रोशनी
बच्चों लौटती है हंसी
पुरुषों में लौटता है पौरुष
आकाश अपनी जगह
दिखाई देता है
पृथ्वी घूमती है
अपनी धुरी पर
जब शाम को घरों को
लौटती है काम पर गई स्त्रियाँ
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मंगलवार, 29 सितंबर 2009
कविता
हत्यारे इतिहास नहीं पढ़ते
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हत्यारों की जेब में होता है देश का नक्शा
टुकडों टुकडों में , अलग अलग जेब में
अलग अलग भाषा में
हत्यारे नक्शा जोड़ते नहीं
हत्यारे सिलवाते रहते है नयी नयी जेबे
हत्यारों की नस्ल बहुत पुरानी है
हत्यारे पाए जाते है ,हर देश हर काल में
हत्यारों की सुरक्षा करते है हत्यारे
हत्यारों का कोई दुश्मन नहीं होता
हत्यारे मारे जाते है दोस्तों के हाथों
इतिहास में
स्वर्ण अक्षरों में लिखी गई है
हत्यारों की गौरव गाथा
हत्यारे रचते है इतिहास
हत्यारे इतिहास नहीं पढ़ते
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हत्यारों की जेब में होता है देश का नक्शा
टुकडों टुकडों में , अलग अलग जेब में
अलग अलग भाषा में
हत्यारे नक्शा जोड़ते नहीं
हत्यारे सिलवाते रहते है नयी नयी जेबे
हत्यारों की नस्ल बहुत पुरानी है
हत्यारे पाए जाते है ,हर देश हर काल में
हत्यारों की सुरक्षा करते है हत्यारे
हत्यारों का कोई दुश्मन नहीं होता
हत्यारे मारे जाते है दोस्तों के हाथों
इतिहास में
स्वर्ण अक्षरों में लिखी गई है
हत्यारों की गौरव गाथा
हत्यारे रचते है इतिहास
हत्यारे इतिहास नहीं पढ़ते
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शनिवार, 26 सितंबर 2009
कविता
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हत्यारों के सिर पर नहीं होते सींग
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हत्यारे विदेशों से आयातित नहीं होते
न ही हत्यारों के सिर पर होते हैं सींग
हत्यारे नास्तिक नहीं होते
ईश्वर होता है
हत्यारों की मुट्ठी में बंद
धर्म ग्रन्थ होते है उनके हथियार
हर हत्या के बाद
उनकी आँखों में होते है आंसू
हत्यारे होते है दानवीर
हर हत्या के बाद लुटाते है स्वर्ण मुद्राएँ
हत्यारे वहां नहीं होते
जहाँ होती है हत्या
हत्यारे सदैव होते है हमारे आसपास
हत्यारे पहचाने नहीं जाते
हत्यारे हमारे सामने से
गुजर जाते है हाथ बांधें
हम नतमस्तक रहते हैं
हत्यारों के प्रति
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मंगलवार, 22 सितंबर 2009
कविता
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हत्यारे नहीं देखते स्वप्न
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हत्यारों के चेहरों पर
होती है विनम्र हंसी
हत्यारे कभी हत्या नहीं करते
हत्यारे निर्भय हो कर
घूमते है शहर की सड़कों पर
हत्यारों के हाथों में नहीं होते हथियार
हत्यारों की कमीज़ के कालर
पर नहीं होता मैल
वे पहनते है उजले कपडे
उनके हाथ होते है बेदाग और साफ़
हत्यारों को रात भर
नींद नहीं आती
हत्यारे नहीं देखते स्वप्न
हत्यारों का ज़िक्र
होता है कविताओं में
हत्यारे कविता नहीं पढ़ते
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हत्यारे नहीं देखते स्वप्न
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हत्यारों के चेहरों पर
होती है विनम्र हंसी
हत्यारे कभी हत्या नहीं करते
हत्यारे निर्भय हो कर
घूमते है शहर की सड़कों पर
हत्यारों के हाथों में नहीं होते हथियार
हत्यारों की कमीज़ के कालर
पर नहीं होता मैल
वे पहनते है उजले कपडे
उनके हाथ होते है बेदाग और साफ़
हत्यारों को रात भर
नींद नहीं आती
हत्यारे नहीं देखते स्वप्न
हत्यारों का ज़िक्र
होता है कविताओं में
हत्यारे कविता नहीं पढ़ते
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रविवार, 20 सितंबर 2009
कविता
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खिलौना खरीदने से पहले
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बार बार मेरे हाथ
जाते है कभी भालू की पीठ पर
कभी बन्दर की नाक पर
और लौट आते है तेजी से
जैसे किसी ने गडा दिए हों नुकीले दांत
मैं कुछ झेंप कर
पूछने लगता हूँ दाम
एरोप्लेन या हेलिकोप्टर के
मेरे सामने
खिलौनों की अदभुत दुनिया है
सोती जागती गुडिया है
और ख्यालों में है
एक बच्चा -जिसने
फरमाइश की थी एक गन की
अपने दोनों हाथ पाकिट में
डाल कर दुकानदार की और देख
मुस्कराते हुए मुझे भी
जरूरत महसूस होती है
एक गन की
कोई भी खिलौना खरीदने से पहले
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खिलौना खरीदने से पहले
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बार बार मेरे हाथ
जाते है कभी भालू की पीठ पर
कभी बन्दर की नाक पर
और लौट आते है तेजी से
जैसे किसी ने गडा दिए हों नुकीले दांत
मैं कुछ झेंप कर
पूछने लगता हूँ दाम
एरोप्लेन या हेलिकोप्टर के
मेरे सामने
खिलौनों की अदभुत दुनिया है
सोती जागती गुडिया है
और ख्यालों में है
एक बच्चा -जिसने
फरमाइश की थी एक गन की
अपने दोनों हाथ पाकिट में
डाल कर दुकानदार की और देख
मुस्कराते हुए मुझे भी
जरूरत महसूस होती है
एक गन की
कोई भी खिलौना खरीदने से पहले
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सोमवार, 14 सितंबर 2009
बच्चा हँसता है स्वप्नों में
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खिड़की से आती धूप को
बंद कर लेना चाहता मुट्ठी में
पापा धूप पकड़ में क्यों नहीं आती
पापा हवा दिखाई क्यों नहीं देती
क्या पेड़ पर पत्तों के हिलने से आती हवा
बच्चे को गुस्सा आता है
पापा जवाब क्यों नहीं देते
बच्चा पैर पटकता चला जाता है
बाहर मैदान में
पापा को कुछ नहीं आता
बच्चा उड़ना चाहता है
चिडियों की तरह
बच्चा तैरना चाहता है
मछलियों की तरह
बच्चा पेड़ पर चढ़ना चाहता है
गिलहरी की तरह
बच्चा सुनता है कहानियां
कभी आश्चर्य से
फ़ैल जाती है उसकी आँखें
कभी भय से
सिमट आता है पापा के पास
कभी ख़ुशी से
पीटता है तालियाँ
बच्चा सवाली निगाहों से
देखता है पापा को
पर पूछता कुछ नहीं
खुद ही डूब जाता है सवालों में
और गढ़ता है जवाब
बच्चा सो जाता है
पापा से चिपट कर
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खिड़की से आती धूप को
बंद कर लेना चाहता मुट्ठी में
पापा धूप पकड़ में क्यों नहीं आती
पापा हवा दिखाई क्यों नहीं देती
क्या पेड़ पर पत्तों के हिलने से आती हवा
बच्चे को गुस्सा आता है
पापा जवाब क्यों नहीं देते
बच्चा पैर पटकता चला जाता है
बाहर मैदान में
पापा को कुछ नहीं आता
बच्चा उड़ना चाहता है
चिडियों की तरह
बच्चा तैरना चाहता है
मछलियों की तरह
बच्चा पेड़ पर चढ़ना चाहता है
गिलहरी की तरह
बच्चा सुनता है कहानियां
कभी आश्चर्य से
फ़ैल जाती है उसकी आँखें
कभी भय से
सिमट आता है पापा के पास
कभी ख़ुशी से
पीटता है तालियाँ
बच्चा सवाली निगाहों से
देखता है पापा को
पर पूछता कुछ नहीं
खुद ही डूब जाता है सवालों में
और गढ़ता है जवाब
बच्चा सो जाता है
पापा से चिपट कर
बच्चा हँसता स्वप्नों में
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मंगलवार, 8 सितंबर 2009
जब वे बच्चे नहीं रहेगें
जब वे बच्चे नहीं रहेगें
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जब वे बच्चे नहीं रहेगें
तब वे तलाशेगें
वे रास्ते जहाँ से
गुजरते थे दिन में कई कई बार
उनकी आँखों में उभर आयेंगे
एक साथ कई शहर
पीले,हरे,सफ़ेद मकान
और बदलते पडौसी
यात्रा दर यात्रा
बस की खिड़कियों से
पीछे छूटते मकान
खेत और गायें
बस में
मूंगफली बेचता लड़का
झगड़ता हुआ एक गंजा आदमी
जब बच्चे नहीं रहेगें
तब वे भूल चुके होंगे
स्कूल का रास्ता
लेकिन याद रहेगी
अंग्रेजी पढाने वाली टीचर
जो दिखती थी परियों जैसी
जब वे बच्चे नहीं रहेगें
तब वे नहीं ढूंढ पाएंगे
अपने उन दोस्तों को
जिनके साथ खेलतेथे
झगडा होने पर
फाड़ दिया करते थे
एक दूसरे की कमीज़
जब वे बच्चे नहीं रहेगें
तब उनके पास शेष रह जाएँगी स्मर्तियाँ
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जब वे बच्चे नहीं रहेगें
तब वे तलाशेगें
वे रास्ते जहाँ से
गुजरते थे दिन में कई कई बार
उनकी आँखों में उभर आयेंगे
एक साथ कई शहर
पीले,हरे,सफ़ेद मकान
और बदलते पडौसी
यात्रा दर यात्रा
बस की खिड़कियों से
पीछे छूटते मकान
खेत और गायें
बस में
मूंगफली बेचता लड़का
झगड़ता हुआ एक गंजा आदमी
जब बच्चे नहीं रहेगें
तब वे भूल चुके होंगे
स्कूल का रास्ता
लेकिन याद रहेगी
अंग्रेजी पढाने वाली टीचर
जो दिखती थी परियों जैसी
जब वे बच्चे नहीं रहेगें
तब वे नहीं ढूंढ पाएंगे
अपने उन दोस्तों को
जिनके साथ खेलतेथे
झगडा होने पर
फाड़ दिया करते थे
एक दूसरे की कमीज़
जब वे बच्चे नहीं रहेगें
तब उनके पास शेष रह जाएँगी स्मर्तियाँ
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