कविता
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जरूरी कुछ भी नहीं है
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जरूरी कुछ भी नहीं है
न तुम्हारा होना न मेरा होना
उन सब दस्तावेजों को
छुपा देने से क्या होगा
जिसे तुम षड़यंत्र की शुरुआत समझते हो
दोस्त वो वास्तव में अंत है
मेरा और तुम्हारा अंत
फिर तुम स्वयं समझदार हो
जानते हो जरूरी कुछ भी नहीं है
पर करना सब कुछ पड़ता है
एक अभ्यस्त सी जिन्दगी जीते रहना
और रोटी के साथ
कविता को पचाते रहना
तुम ही बताओ
क्या ये सब पूर्व नियोजित
षड़यंत्र नहीं है , तुम्हारा और
मेरा होना चाहे अनायास रहा होगा
पर दोस्त ,तुम्हारा और मेरा
जीना अनायास नहीं है
तुम क्यों किसी षड़यंत्र में
भागीदार बनते हो
संघर्ष क्यों नहीं करते
जो हो रहा है उसके विरूद्ध
जबकि जरूरी कुछ भी नहीं है
न तुम्हारा होना न मेरा होना
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[ प्रथम काव्य -संग्रह ' शेष होते हुए '[ १९८५ से]
शुक्रवार, 15 अक्टूबर 2010
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तुम क्यों किसी षड़यंत्र में
जवाब देंहटाएंभागीदार बनते हो
संघर्ष क्यों नहीं करते
जो हो रहा है उसके विरूद्ध......बहुत अध्भुत पंक्तियां...थप-थपाती जागृतिकी क़ोशिश......साथ-साथ...... ख़ुद... की हदों में बंधे होने की गवाही....
जबकि जरूरी कुछ भी नहीं है
न तुम्हारा होना न मेरा होना
.....बहुत अच्छा लगा जी.
बहुत अच्छी लगी यह कविता.
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